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एक छोटा असित सेन, एक मोटा असित सेन..! : 'परिवार' और 'अपराधी कौन' जैसी फिल्में भी बनाईं

📅 26 August 2026, 07:49 PM • ✍️ paliwalwani • ⏱️ 18 मिनट में पढ़ें
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एक छोटा असित सेन, एक मोटा असित सेन..! : 'परिवार' और 'अपराधी कौन' जैसी फिल्में भी बनाईं
एक छोटा असित सेन, एक मोटा असित सेन..! : 'परिवार' और 'अपराधी कौन' जैसी फिल्में भी बनाईं

Pankaj Shukla...

हिंदी सिनेमा को चाहने वालों में शायद ही कोई ऐसा होगा जो असित सेन का नाम न जानता हो। लेकिन, कौन से असित सेन को जानते हैं आप? वो जिनकी भारी-भरकम काया, धीमी आवाज़ और भोली-सी हास्य शैली ने उन्हें पाँचवें-छठे दशक से लेकर अस्सी-नब्बे के दशक तक हिंदी फिल्मों का यादगार चरित्र अभिनेता बनाए रखा? या वो असित सेन जिसके निर्देशन में काम करके सुचित्रा सेन, वहीदा रहमान और हेमा मालिनी ने अपने श्रेष्ठतम अभिनय के उदाहरण पेश किए? 

जी हां, हिंदी सिनेमा में दो असित सेन हुए। अपने हास्य के लिए मशहूर असित सेन ख़ुद ऐसे मौके पर कहते थे, “एक छोटा असित सेन, एक मोटा असित सेन..!” हास्य अभिनेता असित सेन ने बिमल रॉय के साथ बतौर सहायक ख़ूब काम किया और उनकी प्रोडक्शन कंपनी के लिए 'परिवार' और 'अपराधी कौन' जैसी फिल्में भी बनाईं।

लेकिन, आज ‘ताकि सनद रहे’ की इस कड़ी में हम बात करने जा रहे हैं, दूसरे असित सेन की, जिनका जन्म 24 सितंबर 1922 को ढाका में हुआ और जिन्होंने बंगाली तथा हिंदी सिनेमा में निर्देशक, पटकथा लेखक, छायांकन और डॉक्यूमेंट्री निर्माण जैसी कई भूमिकाएँ निभाई और 25 अगस्त 2001 को अपने पीछे एक अलग यादगार सिनेमाई दौर छोड़ गए।

निर्देशक असित सेन की अपनी यात्रा कलकत्ता (अब कोलकाता) में फोटोग्राफी से शुरू हुई। उनके मामा रामानंद सेनगुप्ता सिनेमैटोग्राफर थे और उन्हीं के कैमरे से असित सेन ने स्थिर चित्र लेना शुरू किया। 

लेकिन, निर्देशक असित सेन के बारे में शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह कैमरे से पहले कहानी के आदमी थे। उनका विश्वास था कि विस्तृत पटकथा तैयार होने के बाद ही कैमरे की ओर जाना चाहिए। वहीदा रहमान ने उनकी मृत्यु के अगले दिन अपने एक संस्मरण में कहा था, “वह पटकथा की समझ रखने वाले बहुत अच्छे निर्देशक थे। उनके निर्देशन में अभिनेता को भावनाएँ बतानी नहीं पड़ती थीं, उसे उस स्थिति में पहुँचा दिया जाता था जहाँ भावनाएँ अपने आप चेहरे पर उतर आएँ।” 

यह कहानी इसलिए भी दिलचस्प है कि असित सेन ने शुरुआत में ही अपने लिए कोई आसान रास्ता नहीं चुना। 1956 की 'चलाचल' ने उन्हें बंगाली सिनेमा में निर्देशक के रूप में स्थापित किया। इसके बाद 'पंचतपा' और 'जोनाकिर आलो' जैसी फिल्मों में उन्होंने लोकप्रियता से अधिक अपनी रचनात्मक बेचैनी को महत्व दिया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, “लोग मुझे 'जीवनतृष्णा', 'चलाचल', 'उत्तर फाल्गुनी' और 'दीप जले जाई' के लिए जानते हैं, जबकि मेरी अपनी फ़िल्मों में मुझे 'जोनाकिर आलो', 'स्वयंवरा', 'स्वरलिपि' और 'पंचतपा' थीं पसंद हैं। लेकिन, अफ़सोस कि अब इनके प्रिंट तक उपलब्ध नहीं हैं!”

और, यही वह जगह है जहाँ असित सेन की कहानी एक निर्देशक की निजी जीवनी से निकलकर भारतीय सिनेमा की सामूहिक स्मृति की कहानी बन जाती है। चार साल पहले कोलकाता इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ने असित सेन की जन्मशती पर उन्हें याद किया, लेकिन उनकी 'स्वरलिपि' और 'पंचतपा' जैसी फिल्में स्क्रीनिंग के लिए उपलब्ध न होने की समस्या तब भी सामने थी। 

  • असम के वरिष्ठ पत्रकार उत्पल दत्ता बताते हैं, “असित सेन की फ़िल्मी यात्रा असमिया फ़िल्म 'बिप्लवी' (1950) से शुरू हुई थी। आज़ादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फ़िल्म के दौरान असित सेन असम के नगांव में रहते थे। वहीं उनकी मित्रता शरत बरुआ से हुई। बाद में जब 'चलाचल' को सफलता मिली तो शरत बरुआ ने इस खुशी को एक अनोखे ढंग से यादगार बनाया। उन्होंने अपने नए शुरू किए गए रेस्तरां का नाम ही 'चलाचल' रख दिया। देखते ही देखते यह रेस्तरां असम में एक प्रतिष्ठित और चर्चित नाम बन गया।”
  • निर्देशक असित सेन की सबसे बड़ी पहचान 'दीप जले जाई' (Deep Jweley Jaai)से बनती है। 1959 में बनी इस बंगाली फ़िल्म में सुचित्रा सेन ने मानसिक अस्पताल की नर्स का वह किरदार निभाया जो मरीजों के भीतर की दुनिया में प्रवेश करते-करते स्वयं भावनात्मक संकट में फँस जाती है। असित सेन को इस कहानी में दिलचस्पी इसलिए नहीं थी कि यह एक असामान्य प्रेमकथा थी, बल्कि इसलिए कि इसमें पेशे और निजी भावना की सीमाएँ लगातार टूटती हैं। 

    असित सेन के सिनेमा में यह कोई आकस्मिक विषय नहीं है। उनकी फिल्मों में मनुष्य की बाहरी सामाजिक पहचान के पीछे छिपा हुआ भावनात्मक संसार बार-बार कथा का वास्तविक केंद्र बनता है।

    'दीप जले जाई' में सुचित्रा सेन के अभिनय और असित सेन के निर्देशन का संबंध इतना गहरा था कि बाद में हिंदी में इसी फ़िल्म को 'ख़ामोशी' के रूप में दोहराते समय भी निर्देशक वही रहे। वहीदा रहमान ने बाद में स्वीकार किया कि मूल फ़िल्म में सुचित्रा सेन उनसे कहीं बेहतर थीं। लेकिन उसी बातचीत में उन्होंने याद किया कि वह अभिनेता से सूक्ष्मतम भावनाएँ निकालने की अद्भुत क्षमता रखते थे।

    'दीप जले जाई' के बाद 'उत्तर फाल्गुनी' आई, जिसमें सुचित्रा सेन ने माँ और बेटी की दोहरी भूमिका निभाई। फ़िल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता और असित सेन की प्रतिष्ठा को बंगाली सिनेमा में और मजबूत किया। लेकिन वह अपनी कहानी को बंगाली दर्शकों तक सीमित रखने वाले फ़िल्मकार नहीं थे। इसी कथा को उन्होंने हिंदी में 'ममता' नाम से बनाया। सुचित्रा सेन फिर केंद्र में थीं, साथ में अशोक कुमार और धर्मेंद्र जैसे कलाकार। यह केवल भाषा बदलने का मामला नहीं था। असित सेन अपनी कहानी को दूसरे दर्शक-समाज में फिर से रख रहे थे और उसके भावनात्मक अर्थ को उसी तरह बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे। 

    फिर 1968 में आई 'अनोखी रात', जिसे आज भी बीती सदी के सातवें दशक की विशिष्ट फिल्मों में गिना जाना चाहिए। संजीव कुमार, ज़हीदा, तरुण बोस, अरुणा ईरानी और अन्य कलाकारों वाली इस फ़िल्म की कहानी एक ही रात में कई लोगों को एक जगह ले आती है और उस रात के भीतर उनके जीवन की परतें खुलती जाती हैं। 

    लेकिन, असित सेन की हिंदी सिनेमा में सबसे स्थायी पहचान फ़िल्म 'ख़ामोशी' ने बनाई। 1969 में बनी यह फ़िल्म 'दीप जले जाई' की हिंदी रीमेक थी और, इस बार वहीदा रहमान ने उस नर्स की भूमिका निभाई जिसे सुचित्रा सेन ने मूल फ़िल्म में निभाया था। 'ख़ामोशी' अपने आप में एक महत्वपूर्ण फ़िल्म बनी, खासकर वहीदा रहमान के अभिनय, कमल बोस की छायांकन शैली और हेमंत कुमार के संगीत के कारण।

    'ख़ामोशी' की असली ताकत उस निर्देशन में थी जो पहली बार फ़िल्म देखने पर शायद समझ में नहीं आती है। वहीदा रहमान ने अपने संस्मरण में याद किया, “फ़िल्म के गाने 'हमने देखी है उन आँखों की' की शूटिंग के दौरान मुझे रेडियो पर बजते गीत को लेकर क्लोज अप में केवल अपनी आँखों से प्रतिक्रिया देनी थी। असित सेन ने उन्हें इतनी सहजता से उस भावभूमि में पहुँचाया कि गाना एडिट होने के बाद मुझे भी यक़ीन नहीं हुआ कि ये यह अभिनय मैंने किया है।” 

    फ़िल्म “खामोशी” में हीरो राजेश खन्ना के नाम की सिफ़ारिश भी वहीदा रहमान ने ही की थी। लेकिन इस फ़िल्म के गाने 'वो शाम कुछ अजीब थी' की शूटिंग के समय राजेश खन्ना लगातार हिचक रहे थे। वहीदा रहमान उनसे बहुत सीनियर अभिनेत्री थीं और उनके साथ रूमानी वह हो ही नहीं पा रहे थे। वहीदा रहमान बताती हैं कि जिस सहजता से असित सेन ने राजेश खन्ना की हिचक निकाली, वह दूसरे निर्देशकों के लिए एक सबक है।

    फ़िल्म 'ख़ामोशी' के बाद 'सफ़र' में असित सेन ने राजेश खन्ना को बिल्कुल दूसरी स्थिति में रखा। 1970 की इस फ़िल्म में वह कैंसर से जूझते अविनाश की भूमिका में थे। यह वही दौर था जब राजेश खन्ना की लोकप्रियता चरम की ओर बढ़ रही थी, लेकिन असित सेन ने उनके स्टारडम का इस्तेमाल रोमांटिक इमेज़ के लिए नहीं किया। उन्होंने मृत्यु की ओर बढ़ते एक आदमी को केंद्र में रखा।

    असित सेन के साथ जिस भी कलाकार ने काम किया, उसने उनके निर्देशन को हमेशा याद रखा। राजेश खन्ना के इंटरव्यूज़ में जहां 'सफ़र' का ज़िक्र मिलता है, वह फ़िल्म के निर्देशक असित को एक संवेदनशील निर्देशक के रूप में याद करते हैं। राजेश खन्ना ने कहा कि इस फ़िल्म की भावनात्मक प्रकृति ने उनके प्रशंसकों को इतना विचलित किया कि उन्हें रोज़ ऐसे पत्र मिलने लगे जिनमें उनसे भविष्य की फिल्मों में मरने से बचने की अपील की जाती थी। 

    'सफ़र' ने असित सेन को फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार भी दिलाया। इसके बाद 'शराफ़त' में उन्होंने धर्मेंद्र और हेमा मालिनी जैसे सितारों के साथ काम किया। फ़िल्म के शीर्षक में ही एक विडंबना छिपी थी। समाज किसे शरीफ़ मानता है और किसे नहीं? एक तवायफ़ को उसके पेशे से परिभाषित करने वाली सामाजिक नैतिकता के सामने फ़िल्म ने मनुष्य की व्यक्तिगत गरिमा को रखा। 

    और, फिर आई हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित फ़िल्मों में से एक 'बैराग'। 1976 में बनी इस फ़िल्म में दिलीप कुमार ने तीन भूमिकाएँ निभाईं। लेखक मंडली में अबरार अल्वी, एस. ख़लील और राही मासूम रज़ा जैसे नाम थे। तीन भूमिकाएँ निभाने वाले दिलीप कुमार को तीन अलग व्यक्तित्वों में विश्वसनीय बनाना किसी भी निर्देशक के लिए आसान काम नहीं था। 'बैराग' की सफलता भले 'सफ़र' जैसी नहीं रही, लेकिन फ़िल्म ये बताती है कि असित सेन बड़े सितारों की लोकप्रिय छवि के पीछे छिपे अभिनेता को चुनौती देने से नहीं डरते थे।

    आगे बढ़ने से पहले आज के ‘ताकि सनद रहे’ में एक क़िस्सा महेश भट्ट का। ये उन दिनों की बात है जब महेश भट्ट अपनी शुरूआती फ़िल्मों को लेकर इतराते फिरते थे। उन्हीं दिनों एक फिल्मी पार्टी में हुई वह असित सेन से टकरा गए। असित सेन ने छूटते ही कहा, “You’re no damn director!” महेश भट्ट की यूँ लगा कि जैसे किसी ने उनके गुब्बारे में पिन चुभो दी है। 

    असित सेन के निधन की ख़बर जब मुंबई के अख़बारों में बहुत संक्षेप में छपी तो महेश भट्ट ने बाकायदा एक लेख लिखकर इस निर्देशक को याद किया। महेश भट्ट ने लिखा कि उस वाक्य ने उन्हें झकझोर दिया था और वर्षों बाद जब उन्हें 'ज़ख़्म' के लिए पुरस्कार मिला तो उन्हें पुरस्कार देने मंच पर आए, असित सेन! महेश भट्ट लिखते हैं, “असित सेन ने मुझे बताया कि फ़िल्में सिर्फ सुंदर तस्वीरों से परदे को सजा देना नहीं है। इंसान के भीतर छिपे दर्द और उसकी घुटन को कैमरे के ज़रिये आम दर्शकों के दिल तक पहुंचाना ही सिनेमा है।”

    आज का ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ असित सेन की इसी निर्देशकीय क्षमता को समर्पित है। विडंबना यह है कि जिस निर्देशक ने अपने समय के इतने बड़े कलाकारों के भीतर से इतने सूक्ष्म अभिनय निकाले, उसका अपना नाम धीरे-धीरे उन कलाकारों की छाया में चला गया। 'ख़ामोशी' याद रही तो वहीदा और राजेश खन्ना याद आए। 'सफ़र' याद रही तो राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर सामने आए। 'ममता' की चर्चा हुई तो सुचित्रा सेन का नाम पहले आया। 'बैराग' का उल्लेख हुआ तो दिलीप कुमार के तीन चेहरे याद आए। 

    इन फ़िल्मों के निर्देशक असित सेन का नाम आज की पीढ़ी को भी याद रहे, इसीलिए ये प्रयास है। उन्होंने सिनेमा में ख़ामोशी को केवल विषय नहीं बनाया, उसे निर्देशन की भाषा बनाया। उन्होंने जाना कि कलाकार की आँखें कभी-कभी पूरे संवाद से ज्यादा बोल सकती हैं, किसी गीत को कहानी के बीच रखकर भी उसे कहानी का मनोवैज्ञानिक हिस्सा बनाया जा सकता है, ज़माने के सबसे बड़े स्टार को भी उसकी लोकप्रिय छवि से बाहर निकालकर एक असुरक्षित, मरते हुए, प्रेम करते हुए या टूटते हुए मनुष्य में बदला जा सकता है और यह भी किसी स्त्री की कहानी को उसकी सामाजिक पहचान से नहीं, उसके भीतर की शख़्सीयत से भी देखा जा सकता है।

    इसलिए आज जब हम असित सेन को याद करते हैं तो केवल 'ख़ामोशी', 'सफ़र', 'ममता', 'अनोखी रात', 'शराफ़त' या 'बैराग' की सूची नहीं बनानी चाहिए। हमें उस निर्देशक को याद करना चाहिए जिसने अपने समय के मुख्यधारा के सिनेमा के भीतर संवेदना की ऐसी जगह बनाई, जहाँ कैमरा दर्शकों को चौंधियाने के लिए नहीं। जहाँ अभिनेता अभिनय करता नहीं दिखाई देता है और कहानी अपने निष्कर्ष से पहले ही दर्शक के भीतर उतर जाती है। जै जै!

  • #AsitSen #TaakiSanadRahe #BioscopeWithPankajShukla
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