बेटी और बेटे में भेदमत करना...यह ही मां बाप की दोनों आंखें हैं...
बेटीयों पर तो बहुत मिलता है, पढ़ने, समझनें के लिये, जान भी लुटा देते हो...तुम बेटीयों के लिए, खुब पढ़ानें लिखाने में...तुम पुजी भी वार देते हो, पर कभी बेटे के चेहरे को पढ़ा तुमने, सदा कोसते रहते हो, कांटों की तरहां, कांधों पर हाथ रख कभी पींठ थपथपाई तुमने,,,???
कभी शाबासी से नवाजा तुमने, सदा...सदा ही जुम्मैदारीयों का पाठ पढ़ाते रहे,,,,,कभी झांका उसकी आंखों में, ख्वाहिशों और तमन्नाओं को तुमने,,, उसे कुछ कहना है तो,,, खुद तो नहीं,, उसकी मां से कहलवाते हो,,,हां माना कि बेटीयां,,,पराये घर को जानी है,,,पर यह तो मालुम है ना,,कि,,राखी और भाई दूज,,मनाने,,बेटा ही जाता है,,, स्नेह की चुनरी,, प्यार से हाथों में सुकून देता है,,, कभी भेदमत करना बेटी और बेटे में,,यह ही मां बाप की दौनो आंखें हैं,,,
फतेहलाल जी जोशी
पालीवाल ब्राह्मण समाज 44 श्रेणी इंदौर, मध्य प्रदेश
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