कंक्रीट के जंगलों में खो गईं संझा माता, मालवा-निमाड़ के आँगनों से विदा होती एक साझी संस्कृति
न दीवारें कच्ची रहीं, न पशुधन बचा, इंटरनेट के शोर में मौन हो गए संझा माई के पारंपरिक गीत
शहरीकरण की भेंट चढ़ी हमारी लोक विरासत, संझा का आगमन तो हुआ, पर कहाँ खो गया वो पुराना उल्लास?
स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सिमट गई लोक कला, गायों की घटती संख्या और पक्के मकानों ने छीनी आँगनों की रौनक
आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ही जड़ों से दूर होता मालवा-निमाड़, क्या किताबों में ही बची रहेगी 'संझा'?
संझा का आगमन तो हुआ, पर किसी को खबर ही नही। कहाँ खो गया वो पुराना उल्लास? जो संझा माता के लोकपर्व पर कभी चहुँओर छा जाता था? आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी ही जड़ों से दूर होता मालवा-निमाड़ आज एक बड़े सांस्कृतिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। श्राद्ध पक्ष के इन 16 दिनों में कभी जिन आँगनों और गलियों में संझा माई की अगवानी के लिए उत्सव जैसा माहौल होता था, वहाँ आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है।
न दीवारें कच्ची रहीं, न पशुधन बचा और इंटरनेट के शोर में संझा माई के पारंपरिक गीत कहीं मौन हो गए हैं। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सिमट गई लोक कला, गायों की घटती संख्या और पक्के मकानों ने हमारे आँगनों की वो सोंधी रौनक छीन ली है। परंपराओं से मुँह मोड़ती नई पीढ़ी के बीच, यह मालवा-निमाड़ के एक जीवंत लोक पर्व के दम तोड़ने की सबसे मार्मिक दास्ताँ है, ...ग़र आप सुनना चाहे...!!
- नितिनमोहन शर्मा
तरक्की की अंधी दौड़ ने हमसे हमारी माटी की सुगंध छीन ली है। जिन कच्चे मकानों की दीवारों पर लड़कियाँ पूरी श्रद्धा और चाव से संज्या माता की आकृतियाँ उकेरती थीं, उन्हें हमने कंक्रीट और टाइल्स के आलीशान डिब्बों (फ्लैट्स) में तब्दील कर दिया है। विडंबना देखिए, जिस त्योहार की आत्मा ही प्रकृति से जुड़ी थी, आज उसे बनाने के लिए न तो शहरों में शुद्ध मिट्टी बची है और न ही गाय का गोबर। हमारे घरों के बाहर बंधी रहने वाली गाएं अब सड़कों पर पॉलिथीन खाने को मजबूर हैं। घटते पशुधन ने इस लोक पर्व की रीढ़ ही तोड़ दी है। जब संज्या को आकार देने के लिए बुनियादी तत्व ही नहीं बचे, तो भला कोई परंपरा कैसे सांस लेगी?
कभी शाम ढलते ही पूरा मोहल्ला छोटी-छोटी बच्चियों और किशोरियों की किलकारियों से गूंज उठता था। "संझा माई जीम ले चूरमो..." और "छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाए..." संझा जी का लाड़ा जी, लुगड़ो लाया जाड़ा जी..जैसे लोक गीतों में मालवा और निमाड़ की सामूहिक आत्मा बसती थी। वह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि बेटियों को अपनी सहेलियों के साथ हंसने, खेलने और लोक कला को जीने का एक खुला आसमान देता था। मगर अफ़सोस, आज इंटरनेट और रील संस्कृति के शोर ने उन मासूम और मीठे सुरों का गला घोंट दिया है। आज की नई पीढ़ी को कृत्रिम त्योहारों की कृत्रिम चकाचौंध तो भा रही है, लेकिन अपनी मिट्टी से उपजा यह अनूठा पर्व उन्हें पिछड़ा नजर आने लगा है।
...तो संझा। ये शहर निष्ठुर हो गए है। यहां लोक उत्सव का स्पंदन नही होता। "नेतागिरी" के लिए एक दिन, एक दीवार पर तुम्हे सजा सँवारकर राजनीति तो की जा रही है लेकिन अब यहां तुम्हारे आने जाने से किसी को फर्क भले ही नही पड़ता। यहाँ तुम्हारे "सोलह दिन" भले ही बिसरा दिए गए है। फिर भी कुछ बच्चियों में कागज की बनी आकृतियों से ही सही, तुम्हे पूजा है। छोटी बस्ती में। तंग इलाके में तुम थी मौजूद। बड़े शहर। बड़ी कालोनी मोहल्लों। ऊंची अट्टालिकाओं में तुम्हारा उत्सव भले ही "आउट डेटेड" हो गया हो। लेकिन गांव अभी जिंदा है। ओर जब तक गांव जिंदा है।तब तक भारत जिंदा है। भारत की आत्मा जिंदा है। तुम्हारा उत्सव जिंदा है।
अब बीसी-किटी पार्टियों में तलाशी जा रही सामूहिकता
संजा बाई, के इस सोलह दिन के श्रंगारित उत्सव को लेकर अब पहले जैसी ललक कही नजर नही आती। न नवयौवनाओं के लिए अब संजा बाई का लोकपर्व कोई महत्व रखता हैं। इसका मतलब ये नही कि नई पीढ़ी सँस्कृति-संस्कार, लोकपर्व-त्यौहार से दूर है। उसे पता ही नही कि हमारे लोकपर्व क्या है? कितने है? कब कब आते है? क्यों आते हैं? क्या महत्व है इन लोकपर्वों का? अब कोई ये पढ़ाता-समझाता नही। इसलिए परस्पर लोगो से जुड़ते ये लोकपर्व खत्म होते जा रहे हैं। सन्जा पर्व का आगमन भी तो समाज की सामुहिकता से ही तो जुड़ा है न? एक समय, एक साथ, एक स्वर में सब एकजुट। अब ये एकजुटता बीसी और किटी पार्टियों में तलाशी जा रही हैं। जहां कृतिम बनाव श्रंगार तो है लेकिन सँस्कृति से असली लगाव नही।
आत्ममंथन का वक्त: क्या किताबों और तस्वीरों में ही बची रहेगी संझा?
यह खबर केवल एक त्योहार के कम होने की सूचना नहीं है, बल्कि हमारी सोई हुई सामूहिक चेतना को एक तीखा तमाचा है। हम खुद को 'ग्लोबल' और 'स्मार्ट' बनाने के चक्कर में इतने खो गए हैं कि अपनी जड़ों को ही काट रहे हैं। संज्या माता का यह सूनापन मालवा-निमाड़ की लोक संस्कृति की वो सिसकी है, जिसे हम सब सुन तो रहे हैं, पर अनदेखा कर रहे हैं। अगर समाज अब भी नहीं जागा और अपनी इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के गंभीर प्रयास नहीं किए, तो वह दिन दूर नहीं जब संज्या माता की यह खूबसूरत परंपरा सिर्फ इतिहास के पन्नों, तस्वीरों और बुजुर्गों की कहानियों में ही सिमट कर रह जाएगी। वक्त आ गया है कि हम ठहरें, सोचें और अपनी बेटियों को फिर से संझा माई की उंगली थमाना सिखाएं।