माँ, बेटा, बहू : ता पाछें कछूक दिन में सास कों अटकाव भयो।

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माँ, बेटा, बहू

ता पाछें कछूक दिन में सास कों अटकाव भयो। 

तब सासने बहू सों कह्यो जो-

श्रीठाकुरजी कों सिंगार करिकै  दरपन दिखाइयो। 

सो हंसत मुख होंइ तो प्रसन्न जानियो। '

सास नदी पर जा बैठी। 

बहू ने श्रृंगार किया। 

ठाकुर जी हंसे नहीं। 

श्रृंगार सभी वैष्णव करते हैं। ऐसे ठाकुर जी हंसते दिखाई दे जायें तो क्या चाहिए! 

न किसी को भरोसा होता है कि ठाकुर जी हंसेंगे। 

विश्वास ही नहीं होता। 

हमारे ऐसे भाग्य कहाँ-ऐसा विचार होता है। 

दिमाग वाले की यही समस्या है। 

बहू भोली थी। इस भोलेपन का परिणाम है। दुनियादारी की दृष्टि से भोलापन ठीक नहीं मगर प्रभु के जगत में तो इसीका परम स्वागत है। 

ऐसे कोई दर्शन थोडे ही देते होंगे प्रभु- यह विचार उसके मन में नहीं आया तो उसने आठ बार श्रृंगार पल्टा। 

कभी कुल्हे, कभी टिपारा, कभी गोल पाग, कभी छज्जेदार। 

बहुत देर हो गयी श्रृंगार करते करते। वह सिंगार करती जाय, बदलती जाय। 

श्याम सनेहिनी तो थी ही, देखती रहे प्रभु का मुख कि कब हास्य झलकता है! 

तब पिछले प्रहर हंसे। 

बहू ने राहत की सांस ली। ढाढस बंधा कि अब सास ने जो कहा वह हुआ। 

"पुष्टि मार्ग में जबलों आर्ति न होंइ तब तांई प्रभु अनुभव न जतावे। 

सो बहूकों आर्ति कराइवे के तांई आठ बेर सिंगार पलटायो। 

तब बहू श्रमित व्है दु:खी भई। 

तब आर्ति उत्पन्न भई। 

तब प्रभु वा पर कृपा करि हंसे। '

हमारे बड़े भाई जलगांव में श्री गोवर्धननाथजी के श्रृंगार करते तो कई बार श्रृंगार बिखर बिखर जाता। तब वे विनती करते-

बावा! आज श्रृंगार क्यों ना धरा रहे हो। कृपा करो। '

फिर श्रृंगार जम जाता। 

अपने अपने हाथ का भी फर्क होता है। 

यहाँ मुखियाजी गंगादासजी श्रीनाथजी के श्रृंगार करते तो श्रृंगार और होते, वासुदेव जी करते तो और, वल्लभदासजी करते तो और। 

श्रृंगार देखकर पता चलता आज किसने श्रृंगार धरे होंगे! 

प्रभु क्या हंसे, फिर तो रोज की बात हो गयी। रोज हास्य विनोद करते। 

इसलिए सानुभव न हो तो मन में यह भाव होना चाहिए कि कब सानुभव हो, कब पता चले प्रभु को कौनसा श्रृंगार प्रिय है और कौनसी सामग्री? 

प्रभु को जो चाहिए वह बहू से मांग लेते। 

उस वैष्णव का कैसा सौभाग्य जो लड्डू धरे और ठाकुर जी कहें- मठडी धर। 

रोटी धरे तो कहें-आज पूडी धर। 

बहू को कोई आपत्ति नहीं। ठाकुर जी को जो चाहिए उसके लिए ठाकुर जी जिम्मेदार। 

बहू कहती-

कछू सेवा में भूल परेगी तो हों अपने पीहर चलि जाउंगी। '

मतलब ठाकुर जी बराबर बताते रहें कब क्या करना है, वह वही करती। 

जब सास सेवा में नहाई तो श्रृंगार करते समय सास को नींद का झोंका आया। 

आना तो नहीं चाहिए मगर प्रभु को लीला करनी हो तो सब कुछ संभव है। 

ठाकुर जी बोले-

मोकों सिंगार बहू के हाथ कौ बोहोत आछौ लागे हैं। 

तातें तू रसोई की सेवा करि, 

और बहू मेरो सिंगार करेगी। '

तब बहू नित्य श्रृंगार करने लगी। 

'सो बहू सों श्रीठाकुरजी हास्यविनोद आदि करि सब रस कौ अनुभव करावते। 

सो वे मा, बेटा, बहू श्रीगुसांईजी के बडेई कृपापात्र भगवदीय हे। 

सो उनकी वार्ता कहाँ तांई कहिए। '

क्रमशः।

" कमलमुखदेखत तृप्त न होय। यह सुखकहा दुहागिनजाने रही निसा भरसोय।। 

जोंचकोरचाहत उडुराजे चंदवदनरहीजोय। नेक अकोरदेतनहिंराधा चाहतपियहिनिचोय।। 

उनतोअपनोंसर्वस्वदीनों एकप्राणवपुदोय। भजनभेदन्यारोपरमानंद जानतविरलाकोय।। "

श्री गिरिराज धरन की जय। 

श्रीनाथद्वारा।

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