यह हिंदी काव्य परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का एक सार्थक प्रयास था। आज का दिन कई दृष्टियों से ऐतिहासिक था। बसंत पंचमी के साथ-साथ यह दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। लेकिन साहित्य प्रेमियों के लिए इस दिन की विशेष महत्ता इसलिए भी है क्योंकि यह महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की जन्म जयंती भी है।
कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने इस आयोजन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि जो बात एक हज़ार शब्दों के लेख-संपादकीय और दो घंटे के प्राइम-टाइम शो भी नहीं कह सकते वहीं बात प्रभावी ढंग से एक शायर या कवि कैसे अपनी दो पंक्तियों में गिने चुने दस बारह शब्दों में कह देता है। कार्यक्रम का सुचारु संचालन पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान विभाग की अध्यक्ष डॉ आरती सारंग ने किया उन्होंने अपनी सहज संवाद शैली से पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में पिरोए रखा।
कार्यक्रम की सबसे मार्मिक शुरुआत प्रसिद्ध कला समीक्षक विनय उपाध्याय द्वारा निराला की जन्म जयंती पर प्रस्तुत 'शब्द राग' से हुई। उन्होंने केवल निराला की कविता नहीं सुनाई, बल्कि उनके काव्य-दर्शन को संगीत के माध्यम से जीवंत कर दिया। उन्होंने समझाया कि निराला हिंदी साहित्य की परंपरा में इसलिए निराले और अनूठे हैं क्योंकि उन्होंने छंद से शुरुआत की, लेकिन वहीं नहीं रुके। निराला ने शब्द की असली शक्ति को पहचाना वह शक्ति जो शब्द के भीतर छिपे अंतर्नाद में है। साथ ही संगीत के अनुशासन को समझा और उन्हें भैरवी राग विशेष रूप से प्रिय था।
विनय उपाध्याय ने निराला की कालजयी रचना का उद्गार किया "वर दे, वीणावादिनि वर दे।" उन्होंने कहा कि संगीत बंधनों को तोड़ता है। जब तक हम बंधनों को नहीं तोड़ेंगे, तब तक स्वाधीनता को महसूस नहीं कर सकते। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की बात नहीं है, बल्कि मानसिक और सामाजिक बंधनों से मुक्ति की बात है।
विनय जी ने निराला की महत्वपूर्ण कृति 'राम की शक्ति पूजा' का पाठ किया। उन्होंने बताया कि यह कविता भोपाल के ही गुंदेचा बंधु के रूप में विख्यात ध्रुपद गायक जोड़ी उमाकांत-रमाकांत ने कंपोज़ की थी। इस संगीत बद्धता में केवल तीन शब्दों का प्रयोग था - "ताक कमसिन वारी"। यह प्रयोग दर्शाता है कि कैसे सीमित शब्दों में भी असीम भाव व्यक्त किए जा सकते हैं। विनय उपाध्याय ने जोर देकर कहा, "स्वयं की आवाज़ को अगर नहीं सुनेंगे तो फिर दूसरों की आवाज़ को कविता में कैसे पिरोएंगे?" यह वक्तव्य आज के युवा रचनाकारों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश था।
निराला को सिर्फ छायावाद के चौथे स्तंभ के रूप में पहचानना उनके कद को छोटा करना है। वे केवल प्रकृति और प्रेम की बात नहीं करते थे, बल्कि सत्ता से संघर्ष भी करते थे। प्रसिद्ध शायर नीदा फ़ाज़ली के शब्दों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा, "छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार, आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार।"
प्रथम कवि के रूप में मंच पर आए रामायण धर द्विवेदी ने अपनी विशिष्ट काव्य शैली से सभी का मन मोह लिया। द्विवेदी ने कहा कि मंच पर उपस्थित सभी कवि ऐसे हैं जो कविता की साधना करने वाले लोग हैं, कविता को साधन मानने वाले नहीं। यह अंतर महत्वपूर्ण है साधना करने वाला कवि कविता के प्रति समर्पित होता है, जबकि साधन मानने वाला उसका उपयोग अपने लाभ के लिए करता है। उनकी रचनाओं में जीवन की छोटी-छोटी आशाओं, संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक अभिव्यक्ति थी। उन्होंने छोटी आशाओं की महत्ता पर एक सुंदर कविता सुनाई:
"जुगनू जैसी जलती-बुझती छोटी-छोटी आशाएं,
जीने का कारण बन जाती छोटी-छोटी आशाएं...
मन की कोमल सी डाली पर
झुंड बनाकर आ जाती
चौकन्नी होकर गौरैया सी
छोटे-छोटे पर से नापे पर्वत चोटी आशाएं
चुपके-चुपके नीच निराशा जब करती हो घर मन में
पग-पग पर जब जाल बिछाए बाधा लाएं जीवन में
हंस देती है अवरोधों को काट चिकौटी आशाएं
जुगनू जैसी जलती-बुझती छोटी-छोटी आशाएं"
उनकी काव्य प्रस्तुति में हर वर्ग का चित्रण था सब कुछ उनके शब्दों में जीवंत हो उठा।
सूरज राय सूरज: नींव के पत्थर बने या गुंबद?
जबलपुर से पधारे सूरज राय सूरज ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत एक गहरे दार्शनिक प्रश्न से की। उन्होंने विद्यार्थियों से पूछा, "यह आप पर है कि आप पत्रकारिता की नींव के पत्थर बनें या गुंबद बनें?" उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलगुरु के नाम की ओर संकेत करते हुए कहा,"चूंकि इस विश्वविद्यालय के कुलगुरु का नाम ही 'विजय' है, तो आपको कभी पराजय तो नहीं मिलेगी।" इस सकारात्मक संदेश ने सभी के मन में उत्साह का संचार किया।
नींव का पत्थर या गुंबद: एक दार्शनिक चिंतन
सूरज जी ने एक मार्मिक रचना प्रस्तुत की:
"नींव का पत्थर कोई भी हो,
सामने अपनी नज़रें नहीं उठाता,
गुंबदों ने गुदवा रखे हैं नाम अपने, पर मैं कोई नाम नहीं लिखता,
हर अकड़ गुंबद की उतर जाएगी,
मैं हिला तो हवेली बिखर जाएगी..."
यह कविता विनम्रता और अहंकार के बीच के अंतर को बखूबी दर्शाती है।
समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की व्यथा सूरज जी की काव्य प्रस्तुति का सबसे मार्मिक हिस्सा समाज के वंचित वर्ग पर केंद्रित था। उन्होंने फुटपाथ पर सोने वाले लोगों की पीड़ा को शब्द दिए:
"पागल है ठंड बर्फ़ है फुटपाथ का बदन,
ओढ़े खुद को या खुद को बिछाएं हम?
नींद की बंदिशों में आंख को जागती है,
ज़िंदगी बर्फ़ है कभी-कभी सुलगती है,
कभी बेबसी, मुफ़्लिसी, ग़म, दर्द, ज़िल्लतें, आंसू....
इतने कपड़ों में भला ठंड कहां लगती है..."
ग्वालियर के राजेश शर्मा ग्वालियर से पधारे राजेश शर्मा ने अपनी प्रस्तुति में प्रेम, प्रकृति और जीवन के विविध रंगों को समेटा। उनकी काव्य शैली में एक अलग ही संवेदनशीलता थी। बसंत पंचमी के अवसर पर उनकी रचना विशेष रूप से प्रासंगिक थी:
"बांध दिए ऋतुराज ने ऐसे बंदनवार,
पीले-पीले हो गए मन के आंगन द्वार...
घट-घट में ऋतुराज ने नवरस दिए उंडेल,
पल-पल कोपल से हुए दिन फूलों की बेल...
यूं तो गंजे बाद में अनगिन नाद निनाद,
लेकिन अनहद सा रहा प्रथम मौन संवाद"
उन्होंने प्रेम में अवरोधों को इस प्रकार व्यक्त किया:
"मैं हूं तट का बांसवन, तू नदिया की धार,
तूफानों ने कर दिए मिलने के आसार...
यूं तो देखा तुम्हें हमने अपने पास,
जैसे पंछी को दिखे पिंजरे से आकाश...
तेरे-मेरे बीच की ऐसी है दीवार,
टकराऊं तो घायल करे, झुक जाऊं तो पार...
इत पानी का बुलबुला, उत पानी की बूंद,
पानी-पानी हो गए दोनों आंखें मूंद..."
लखनऊ के डॉ. सुरेश
डॉ. सुरेश ने अपनी गहन जीवन-दृष्टि और अनुभवों से समृद्ध रचनाएं प्रस्तुत कीं। उन्होंने शुरुआत ही एक मार्मिक पंक्ति से की:
"एक बसंत लिए जीता हूं,
पतझड़ का करके श्रृंगार..."
यह पंक्ति जीवन के विरोधाभासों को दर्शाती है कैसे एक व्यक्ति अपने भीतर बसंत की आशा लिए जीता है, भले ही बाहर पतझड़ का मंजर हो। उसके बाद उन्होंने पूरी कविता पेश की:
"ऐसी हंसी हंसा करता हूं, जिस पर सच की लगी मुहर,
क्या पहचानेगी दुनिया, देखा है उसकी भी तेज़ नज़र,
हंस कर हल्का बोझ किया तो जग ने हल्का जान लिया,
मैंने भी आदत न छोड़ी, उसने भी न रखी कसर...
मैं मौजों रहा खेलता, मेरा किनारा है मझधार,
वैसे तो दिल दुख का दरिया, मैं पानी का पहरेदार,
एक बसंत लिए जीता हूं, पतझड़ का करके श्रृंगार..."
उन्होंने आधुनिक समाज में रिश्तों की विडंबना को इस प्रकार व्यक्त किया:
"सबके सब समझाने आए, लाए प्यारे-प्यारे बोल,
बिन बोले कोई समझाए, मानूं मैं भी मन का मोल,
आंखों की भाषा न समझी, मन की व्यथा न समझी,
ज़ोर-ज़ोर से पीट रहे हैं खाली संबंधों की ढोल...
ऐसे शोर-शराबे से तो बेहतर तनहाई की मार,
वैसे तो दिल दुख का दरिया, मैं पानी का पहरेदार,
एक बसंत लिए जीता हूं...
होंठ खुले तो मिले सामने, आंख तरेरे अपने लोग,
घोले ज़हर ज़िंदगी में, तबीयत से तोड़े सपने लोग,
ये तो हम थे खड़े हो गए, रो कर भी मुस्काने को,
दुख-दर्दों की राम कहानी, इन गीतों में गाने को...
मन जो कहे उसी की मानूं, बाकी बातें हैं बेकार,
वैसे तो दिल दुख का दरिया, मैं पानी का पहरेदार,
एक बसंत लिए जीता हूं, पतझड़ का करके श्रृंगार..."
मासूम ग़ाज़ियाबादी: दुखों को इष्ट मानकर पूजने वाले कवि रामायण धर द्विवेदी ने बहुत सुंदर शब्दों में मासूम ग़ाज़ियाबादी का परिचय दिया और कहा कि, "जिन्होंने लोगों के दुखों को इष्ट मानकर पूजा है"। यह परिचय ही मासूम जी की काव्य-यात्रा को परिभाषित करता है। उनकी की सबसे मार्मिक रचना ग़रीबी में जीने वालों की गरिमा पर थी:
"और यूं भी बचाई हमने ग़रीबी की आबरू,
नंगे भी हम रहे तो अदब से, तमीज़ से,
भूखे भी हुए तो पेट को घुटनों से ढक लिया,
ठंड लगी तो घुटनों को कमीज़ से ढक लिया...
आंसुओं को यहां जिनके दामन भी नहीं मिलता,
जो रोएं तो तुम सीने से लगा लेना...
वो पगली इसलिए शायर ठहाकों पर उतर आई,
जवानी में तेरी आंखों का पानी कौन देखेगा...
अंगूठी लाख ये दुष्यंत की दी हुई है,
शकुंतला सुन, तेरा सब पाप ढूंढेंगे निशानी कौन देखेगा,
मेरे तू ऐब क्यों गिनवा रहा है,
अंधेरा चांद को धमका रहा है,
लहू मांगे हैं ज़ुल्फ़ें खुल गईं तो महाभारत को क्यों दोहरा रहा है..."
बेटियों की सुरक्षा पर एक बहुत मार्मिक रचना सुनाई:
"माना के तुझे बेटी प्यार तो करना है हिरनी की तरह,
लेकिन जंगल से गुज़रना है,
जंगल में दरिंदे हैं एक ओर शिकारी भी,
कुनबे से अलग चलकर बेमौत ही मरना है..."
शिक्षा के अधिकार से वंचित बच्चों की त्रासदी को शब्द दिए:
"रखते नहीं परिंदे उसपे घोंसले,
ये मुफ़्लिसी की हद के तकाज़े के,
फ़ीस में बरसों के मासूम रो लिए,
भारी बहार में शाखी को काटने वाले अजीब लोग हैं,
गूंचे तलाश करते हैं,
जिनसे वक़्त के रहते किताब छीनती है,
उन्हीं के हाथ तमंचे तलाश करते हैं...!