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वेश्यावृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी : ‘कोठा’ की परिभाषा पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण

दिल्ली Published by: paliwalwani Updated Mon, 01 Jun 2026 12:10 PM
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नई दिल्ली. वेश्यावृत्ति (Prostitution) से जुड़े करीब 70 साल पुराने कानून की विस्तृत समीक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट (SC) ने स्पष्ट किया है कि देश में लागू अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (ITPA) का उद्देश्य वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना या इसे सीधे तौर पर अपराध घोषित करना नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून का मूल मकसद इसके व्यावसायीकरण और शोषण को रोकना है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि इस कानून का प्रमुख उद्देश्य वेश्यावृत्ति को आजीविका के रूप में संगठित व्यवसाय बनने से रोकना है, न कि केवल इसमें शामिल व्यक्तियों को दंडित करना।

अदालत ने यह टिप्पणी वेश्यालयों से बचाई गई महिलाओं के पुनर्वास से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। फैसले में 1956 में बने कानून का गहन विश्लेषण करते हुए कहा गया कि 20वीं सदी में महिलाओं की तस्करी और यौन शोषण को रोकने की जरूरत के कारण इस कानून का ढांचा तैयार किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम मुख्य रूप से उन लोगों को दंडित करने के लिए बनाया गया था, जो शोषण, तस्करी या वेश्यावृत्ति के व्यवसाय से लाभ कमाते हैं, न कि वेश्यावृत्ति में शामिल महिलाओं को। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि कानून की कुछ धाराएं विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत गतिविधियों को दंडनीय बनाती हैं।

फैसले के अनुसार, अधिनियम की धारा-7 सार्वजनिक स्थानों या संवेदनशील क्षेत्रों के निकट वेश्यावृत्ति से जुड़ी गतिविधियों पर कार्रवाई का प्रावधान करती है, जबकि धारा-8 सार्वजनिक जगहों पर ग्राहकों को आकर्षित करने या बुलाने को दंडनीय मानती है।

बेंच ने कहा कि निजी स्तर पर होने वाली वेश्यावृत्ति को सीधे तौर पर अवैध नहीं माना गया है, लेकिन सार्वजनिक नैतिकता और सामाजिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए स्कूल, धार्मिक स्थल या अन्य सार्वजनिक संस्थानों के आसपास ऐसी गतिविधियों को सीमित करना जरूरी है, ताकि आम लोगों को असुविधा या विवाद की स्थिति का सामना न करना पड़े।

अदालत ने कानून में प्रयुक्त ‘कोठा’ (Brothel) शब्द की भी व्याख्या की। बेंच ने कहा कि यदि कोई महिला अकेले अपने स्तर पर आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करती है और वहां किसी अन्य व्यक्ति या दूसरी महिला की भागीदारी नहीं है, तो ऐसे घर को कानूनी रूप से ‘कोठा’ नहीं माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि कानून की कुछ परिभाषाओं में अस्पष्टता बनी हुई है, क्योंकि कई बार वेश्यावृत्ति को केवल शोषण या अपमानजनक दृष्टिकोण से ही देखा गया है।

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