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गणतंत्र से गुणतंत्र की ओर एक यात्रा : तोताराम सनाढ्य की अमर गाथा और भविष्य का आह्वान

आपकी कलम Published by: paliwalwani Updated Wed, 28 Jan 2026 12:52 AM
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नैवेद्य पुरोहित

26 जनवरी 2026 का दिन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के लिए महज़ एक औपचारिकता नहीं रहा। कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी सर का संबोधन एक ऐसी कहानी से शुरू हुआ जो इतिहास के पन्नों में दबी पड़ी थी। एक ऐसे नायक की कहानी जिसका नाम बहुत कम लोग जानते हैं, मगर जिसका संघर्ष हर भारतीय के दिल को झकझोर देने वाला है।

विवेक सावरकर मृदुल सर के शानदार संचालन में आयोजित इस कार्यक्रम में कुलगुरु ने तोताराम सनाढ्य की वह गाथा सुनाई जो हमें यह सिखाती है कि गणतंत्र दिवस केवल अतीत की महानताओं को याद करने का दिन नहीं, बल्कि भविष्य की ओर कदम बढ़ाने का संकल्प लेने का दिन है।

वो जो इतिहास में खो गए

1947 से पहले जो लोग लाठियां खा रहे थे, जेलों में सड़ रहे थे, कालापानी की सजा काट रहे थे  उनमें से कई नामों को हम जानते है जिनके नाम इतिहास की किताबों में दर्ज हुए। लेकिन उन्हीं दिनों कुछ लोग ऐसे भी थे जो बंधुआ मजदूर की तरह गुलाम बनाकर दूसरे देशों में ले जाए जा रहे थे।

1857 की लड़ाई के बाद भारत को सबसे बड़ी मजदूरी की मंडी के रूप में देखा जाने लगा। बंदरगाहों से जहाजों में भर-भरकर लोगों को ले जाया जाता था। अपनी पीठ में छुरा मारने वाले हर सदी में लोग थे। अंग्रेजों की ऐसी कई कंपनियां थीं उन्हीं में से एक का नाम था 'डाल्ज़'। उसके ऐसे दलाल जो कि भारतीय ही होते थे वो शहरों में जाते थे लोगों को नौकरी का झांसा देकर फसाते थे। साल 1879 से यह क्रम शुरू हुआ जो लगभग 1916-17 तक चला।

फिरोजाबाद से फिजी तक-तोताराम की यात्रा

फिरोजाबाद जिले के हिरनगांव का एक व्यक्ति नौकरी की तलाश में 18 वर्ष की उम्र में सात आने लेकर कोलकाता आया। उसका नाम था तोताराम सनाढ्य था। 'यमुना' नाम के जहाज से निकला वह युवक नौकरी के झांसे में फंस गया। इन लोगों को बताया जाता था कि "आपको फिजी जाना है, वो ओडिशा के पास है।" इन लोगों को यह भी नहीं पता था कि वास्तव में वे कहां जा रहे हैं। लगभग 60,000 लोगों को इस तरह ले जाया गया। इनका जीवन वैसे नहीं गुजरता था जैसे भारत में रहकर क्रांतिकारियों गुजरते थे बल्कि उससे भी बदतर।

एक हफ्ते के खाने के लिए उन लोगों को नाममात्र का राशन मिलता था! कई लोगों ने फिजी पहुंचते ही आत्महत्या करना उचित समझा। करीब 300 लोगों ने नर्क समान हालात में अकेलेपन के अवसाद में फांसी लगा ली।

संघर्ष और साहित्य

फिजी से थोड़ा बहुत पैसा कमाकर तोताराम सनाढ्य 1914 में वापस कोलकाता आए। यहां उन्होंने सबको बताया कि कैसे फिजी में हमारे ही भारतीय बंधु किस प्रकार बंधुआ मजदूरी का दंश झेल रहे थे, यह बात उन्होंने दुनिया को बताई। मारवाड़ी समाज के कारोबारियों ने उनकी मदद की यह समाचार फैलाने के लिए उन्होंने करीब 15,000 पर्चे छपवाए। 

1914 में बनारसीदास चतुर्वेदी से उनकी मुलाकात हुई। उन्होंने अपनी दास्तां बनारसीदास को बताई। बनारसीदास चतुर्वेदी, जो इंदौर के डेली कॉलेज में उस वक्त पढ़ाते थे उन्होंने इस घटनाक्रम पर एक किताब लिखी, "फिजी द्वीप में मेरे 21 वर्ष"। यह किताब प्रकाशित होने के बाद मराठी, बांग्ला, अंग्रेजी, उर्दू में अनुवादित भी हुई। इस किताब की प्रशंसा में बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि "ऐसा कोई भारतीय नहीं होगा जो इसको पढ़ने के बाद रोया नहीं होगा।"

दर्द की दास्तान

फिजी में रहते हुए तोताराम ने एक गुलजारी नाम के कान्यकुब्ज ब्राह्मण की कहानी सुनाई, जो वहां बंधुआ मजदूर बनकर गए थे। गुलज़ारी के रिश्तेदार समझते थे कि विदेश में वहां वह बहुत पैसा कमा रहा है। उनके भाई ने उन्हें पत्र लिख कर वापस घर आने को कहा साथ में यह भी लिखा कि यदि तुम वापस नहीं आए तो "101 गायों की हत्या का पाप लगेगा तुम पर।" 8 साल की मेहनत के बाद 300 रुपये इकट्ठे किए जो उसने इकठ्ठे किए थे। वह लेकर गुलज़ारी वापस अपने वतन लौट आए। यहां वो पैसे उनके सब हड़प लिए गए। गुलज़ारी ने फिजी में रह रहे उसके मित्रों को पत्र लिखा - "मुझे वापस बुला लो फिजी, मेरे भाइयों ने मुझे धोखा दिया।" वहां इनके दोस्तों ने मेहनत कर पाई-पाई जोड़ा और वापस उसे बुला लिया। 

इन मजदूरों के धर्म परिवर्तन भी हुए हैं। कई लोग हिंदू से ईसाई बने कई मुसलमान। इसीलिए वहां अमर-अकबर-एंथनी तीनों की संस्कृति दिख जाएगी। हमारे कुलगुरु को दो साल पहले फिजी में उन बंधुआ मजदूरों की 5वीं पीढ़ी से मिलने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि कई लोगों को वहां अपनी जाति नहीं पता, याद ही नहीं है। 

एक क्रांति का बीज

1920-22 में तोताराम ने 45 गांवों का सर्वे किया जहां के लोग फिजी गए थे। उसने वह रिपोर्ट पंडित जवाहरलाल नेहरू को सौंपी। लेकिन नेहरू ने उस पर कोई रुचि नहीं दिखाई। बनारसीदास चतुर्वेदी ने ओरछा राजघराने के बच्चों को वह किताब पढ़ाई।

संसद में पहुंचने के बाद उन्होंने नेहरू को बोला कि "आप इस विषय पर अपनी रुचि दिखाइए, प्रवासी भवन बनना चाहिए। विदेशों में बहुत से भारतीय प्रवासी है।" उस समय नेहरू ने प्रवासी भवन के लिए जमीन आवंटित की लेकिन तत्कालीन प्रभावशाली नेताओं ने उस पर कब्जा कर लिया।

1922 में जब वो वापस आए, उसके 3 साल बाद कुली प्रथा आखिरी बार बंद हो गई। हमारे विश्वविद्यालय के लिए बड़े गर्व की बात है कि तोताराम सनाढ्य की कहानी वाली वह किताब विश्वविद्यालय परिसर के नालंदा पुस्तकालय में मौजूद है। उस किताब में रुला देने वाले संघर्ष थे। आज़ादी की लड़ाई में जो लोग यहां थे लड़ रहे थे कम से कम अपने घर में थे। परंतु फिजी में वो अनगिनत गुमनाम बंधुआ मजदूरों के पास तो वो भी नहीं था।

गणतंत्र से गुणतंत्र की यात्रा

कुलगुरु ने एक बहुत प्रभावशाली वाक्य कहा, "गणतंत्र को गुणतंत्र की तरफ ले जाने का समय आ गया है।" उन्होंने बताया कि ओशो रजनीश ने एक कॉन्सेप्ट डिस्कस किया था अपने समय में कि डेमोक्रेसी तो ठीक है सबके अधिकार होने चाहिए, लेकिन हमको मेरिटोक्रेसी पैदा करनी चाहिए। गणतंत्र से गुणतंत्र की तरफ जाना चाहिए था।

अगले दो दशक हम सबके जीवन में, हमारे राष्ट्र के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। 2047 का भारत विश्व के मानचित्र पर कैसे चमके यह हम गणतंत्र से गुणतंत्र की तरफ यात्रा से तय करेंगे।

मेरिटोक्रेसी का अर्थ

मेरिटोक्रेसी का मतलब यह है कि गुण पर आधारित कुछ रचा जाए। हम जो कर रहे हैं, रोज कुछ नए प्रयोग करना चाहिए। भले ही वह प्रयोग छोटे-छोटे ही क्यों न हो। कुलगुरु ने स्पष्ट किया, "26 जनवरी केवल औपचारिकता नहीं है। केवल अतीत की महानताओं की कहानियां हमें आज कुछ नहीं देती हैं। हमारा समय और ऊर्जा सदैव सर्वोत्कृष्ट कार्यों में ही लगना चाहिए।"

आज का उनका पूरा यह संबोधन एक बताता है कि तोताराम सनाढ्य जैसे अनगिनत नायकों का संघर्ष व्यर्थ न जाए। उन्होंने जो लड़ाई लड़ी, वो सिर्फ आजादी की नहीं थी वो मानवीय गरिमा की, न्याय की, और सत्य को उजागर करने की लड़ाई थी। आज हर नागरिक का कर्तव्य है कि हम गणतंत्र को गुणतंत्र में बदलें जहां हर व्यक्ति को अवसर मिले, लेकिन योग्यता को सर्वोच्च स्थान मिले। जहां अधिकार भी हों और कर्तव्य भी। जहां लोकतंत्र हो, लेकिन उत्कृष्टता भी। यह वो कहानियां हैं जो हमें प्रेरणा देती हैं यह वो विचार हैं जो हमें दिशा देते हैं और यह वो संकल्प है जो 2047 के भारत को विश्व के मानचित्र पर चमकाएगा। 

जय हिंद! जय भारत!

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