उत्तर प्रदेश.
उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनावों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकल पीठ के फैसले के खिलाफ डबल बेंच में अपील करने का बड़ा निर्णय लिया है। हाई कोर्ट ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने की व्यवस्था पर रोक लगा दी थी।
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की रूपरेखा और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर राज्य सरकार और न्यायपालिका के बीच एक नया कानूनी मोड़ सामने आ गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की एकल पीठ द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने की व्यवस्था पर रोक लगाने के बाद अब योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस फैसले को बड़ी अदालत में चुनौती देने की तैयारी पूरी कर ली है।
शासन के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार इस आदेश के खिलाफ अगले सप्ताह हाई कोर्ट की डबल बेंच या फुल बेंच के समक्ष एक विशेष अपील दायर करेगी। इस निर्णय की पुष्टि उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष और इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस राम औतार सिंह ने भी की है।
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 'प्रेम लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' के केस में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि असंवैधानिक हो चुके नियमों के तहत ग्राम प्रधानों को प्रशासक की भूमिका नहीं सौंपी जा सकती। इसके साथ ही, अदालत ने चुनावों को अनिश्चितकाल के लिए टालने या प्रशासकों का कार्यकाल मनमाने ढंग से बढ़ाने को पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया था।
हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 243 (ई) और 243 (के) का हवाला देते हुए कहा था कि पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता और सरकार को आगामी 13 जुलाई तक चुनाव कराने की पूरी समय-सीमा और रूपरेखा अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया था।
राज्य सरकार के कानूनी सलाहकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश पंचायतीराज अधिनियम 1947 की धारा 12 में जोड़ी गई उपधारा (3-ए) के तहत शासन को यह विशेष शक्ति प्राप्त है। इस कानून के अनुसार, यदि किन्हीं अपरिहार्य परिस्थितियों या लोकहित के कारण ग्राम पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव कराना संभव न हो, तो सरकार को उस अवधि के लिए वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था करने का पूरा अधिकार है।भौगोलिक संदर्भ
यह संशोधन प्रदेश में अप्रैल 1994 से लागू है और अभी तक इसे हटाया नहीं गया है, इसलिए सरकार इसी को अपनी अपील का मुख्य आधार बना रही है। इसके अलावा, कोर्ट द्वारा समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग को इस मामले में पक्षकार बनाने के आदेश को भी चुनौती दी जाएगी, क्योंकि कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट की धारा 9 के तहत आयोग को किसी मुकदमे में पार्टी नहीं बनाया जा सकता।
दूसरी तरफ, सूबे के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग का आरक्षण तय करने के लिए गठित किया गया समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग भी अपनी तैयारियों में जुटा है। आयोग के अध्यक्ष के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों से पिछड़े वर्ग की आबादी के आंकड़े एकत्र कर लिए गए हैं।
आयोग की टीमें अब तक मेरठ, हापुड़ और बागपत जैसे जिलों का जमीनी दौरा कर चुकी हैं, जहाँ ब्लॉक और गाँव के स्तर पर जाकर आंकड़ों का भौतिक सत्यापन किया जा रहा है। आयोग पूरी तरह निष्पक्ष और सटीक अध्ययन के बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट इस साल नवंबर तक शासन को सौंपेगा, जिसके बाद ही राज्य निर्वाचन आयोग की देखरेख में चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकेगा।