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पालीवाल समाज की उत्पति : मेवाड़ के समस्त पालीवाल ब्राह्मण समाज श्री सरशलजी के ऋणी रहेंगे

धर्मशास्त्र Published by: paliwalwani Updated Sun, 07 Jun 2026 12:58 PM
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संपूर्ण विश्व में आर्यावर्त का प्रमुख स्थान है जो राजा भरत के नाम से भारतवर्ष कहलाया। आदिकाल से भारत देश ऋषि-मुनियों का देश होकर पुण्य भूमि माना जाता है। पुरातन भारत में कर्मप्रधान वर्ण व्यवस्था सर्वमान्य थी। वर्ण व्यवस्था के अनुसार चार वर्ण निर्धारित किये गये थे, जो कि निम्नलिखित है.

1 ब्राह्मण 

2 क्षत्रिय 

3 वैश्य

4 शुद्र

हम यहाँ ब्राह्मण समाज का ही उल्लेख करेंगे।

कालांतर में ब्राह्मण समाज दो भागों में विभक्त हुआ। 

1- पंचगौड़:- उत्तर भारत में रहने वाले ब्राह्मण पंचगौड़ कहलाये। 

2- पंचद्रविड़:- दक्षिण भारत में रहने वाले ब्राह्मण पंचद्रविड़ कहलाये, जिसमें गुजरात, महाराष्ट्र आदि है।

भारतवर्ष पुण्यभूमि के पूर्व की ओर का प्रदेश गौड़ प्रदेश कहलाता था, जिसका उल्लेख इतिहास में हम कई जगह पढ़ सकते हैं। यह गौड़ प्रदेश वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश कहलाता है। इस वजह से यहाँ के निवासी ब्राह्मण आदि गौड़ ब्राह्मण कहलाये। आदि गौड़ ब्राह्मण अयाचक प्रवृति के होकर अपनी तेजस्विता और विद्वता के लिए संपूर्ण आर्यावर्त में विशिष्ठ स्थान रखते थे। इनमें से कई ऋषि-मुनियों के परिवारों ने कालांतर में आर्यावर्त के कई राज्यों में जाकर राजपुरोहित के दायित्व का निर्वहन किया। इन्हीं की वंशावली से पालीवाल ब्राह्मण समाज की उत्पत्ति हुई है, ऐसा माना जाता है।

आज भी ये गांव खंडहर के रूप में मौजूद है...

एक कथा के अनुसार महाराज हरिदास एक सच्चे ब्राह्मण थे जो गांव कुंदनपुर (गौड़ प्रदेश) में पैदा हुए थे। महाराज हरिदास भगवान श्री कृष्ण की रानी रुक्मणी के शाही पुजारी थे। उन्होंने ही रानी रुक्मणी के प्रेमपत्र को श्री कृष्ण तक पहुंचाया था। श्री कृष्ण की असीम कृपा से उन्हें अपार संपत्ति और जमीन प्राप्त हुई। उन्होंने हरिपुर गांव को बसाया जो वर्तमान में गुजरात में हैं। आज भी ये गांव खंडहर के रूप में मौजूद है। इतिहास में वहाँ से हमारे पुरखों का मारवाड़ तथा पाली में बसने का उल्लेख मिलता है।

श्री रेवाशंकरजी द्वारा लिखित पालीवाल ब्राह्मण इतिहास पुस्तक के अनुसार भगवान राम के राज्यकाल में अयोध्या में एक ब्राह्मण पंडित भागीरथ जी रहते थे। इनकी 82वीं पीढ़ी में जलभद्रजी हुए ओर 96वीं पीढ़ी में विजयदेवजी हुए। विजयदेव जी के पूर्वज अच्छे विद्वान और व्यापारकुशल होकर संपन्न थे, जिन्होंने गुजरात आकर मूलराजा के द्वारा रुद्रमहालया मंदिर की प्रतिष्ठा कराकर भेंटस्वरूप गुजरात में पाली गाँव प्राप्त किया।

रुद्रमहालया मंदिर के संदर्भ में कहा जाता है कि गुजरात के पाटननगर के चामुंड राजा हुए। उन्होंने अपनी दो पुत्रियों की शादी वाज और बीज नामक राजपुत्रों से कराई। इनके पुत्र मूल हुए। चामुंड राजा के देहावसान के बाद सारी संपत्ति मूल को दे दी। मूल के मामा ने सत्ता हथियाने के लिए कई प्रपंच किए। जब राजा मूल को यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने मामा को मारकर गुजरात की बागडोर अपने हाथ में ले ली। जब वे वृद्ध हुए तो उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ।

ब्राह्मणों की सलाह से ऋषि पत्नियों के आग्रह पर उन्होंने दान स्वीकार किया और प्राण प्रतिष्ठा कराई

ब्राह्मणों की सलाह से सिद्धपुर में रुद्रमहालय (महादेव मंदिर) का निर्माण कराया। राजा ने ऋषियों (विजयदेवजी) को भूमिदान एवं अन्नदान का अनुरोध किया किंतु ऋषियों ने अस्वीकार कर दिया। ऋषि पत्नियों के आग्रह पर उन्होंने दान स्वीकार किया और प्राण प्रतिष्ठा कराई। राजा ने दो प्रांत ऋषियों को भेंट किए। ये प्रांत सिरोही एवं सिद्धपुर थे। सिरोही में रहने वाले सिरोहिया एवं सिद्धपुर में रहने वाले सिद्धपुरिया कहलाए। सिद्धपुर गांव के पास में ही पाली (पलवल) गांव है, अतः यहाँ के निवासी होने के कारण पालीवाल कहलाए। इन तथ्यों के आधार पर पालीवाल ब्राह्मण मूलतः आदिगौड़ औदिच्य ब्राह्मण ही है। राजा मूल द्वारा सहस्त्र गाँव प्राण-प्रतिष्ठा में दान देने के कारण ये सहस्त्र औदिच्य ब्राह्मण भी कहलाये।

पाली के ब्राह्मणों के संबंध में कहा जाता है कि पाली में निवास करने के लिए जो सजातीय ब्राह्मण पाली में आता था, उसे प्रत्येक घर से एक रुपया तथा एक ईंट दी जाती थी, जिससे वह पाली में अपना स्वयं का मकान बना सकता था और लाख रुपया पाकर व्यापार करने योग्य हो जाता था। सहकारिता की ऐसी मिसाल अन्यत्र मिलना मुश्किल है। पालीवाल ब्राह्मणों में व्यापारिक कला एवं धर्म के प्रति आस्था अद्भुत थी। पालीवाल ब्राह्मण दान देने में भी सदैव अग्रणी रहे। जिनमें तुलादान देने की एक विशिष्ट प्रथा रही, जो कालांतर में भी बनी रही। ऐसे थे हमारे दानवीर पूर्वज।

ब्राह्मण पाली गाँव से होने के कारण पालीवाल ब्राह्मण कहलाये

यह सभी ब्राह्मण पाली गाँव से होने के कारण पालीवाल ब्राह्मण कहलाये। पालीवाल शब्द का प्रयोग सभी निवासी ब्राह्मणों को एक सूत्र में बांधने के लिए किया जाने लगा। पालीवाल ब्राह्मणों ने अपने श्रम और कौशल से पाली को इतना विकसित किया कि इसकी चर्चा दूर दराजों में होने लगी, जिसके वैभव से प्रभावित होकर यवनों ने आक्रमण शुरू किए, जिनका पालीवाल ब्राह्मणों ने वीरतापूर्वक सामना कर अपने धर्म और क्षेत्र की रक्षा का भरसक प्रयास किया। किंतु निरंतर आक्रमण के कारण उन्हें पाली से पलायन को मजबूर होना पड़ा। परेशान होकर इन पालीवाल ब्राह्मणों ने तत्कालीन मेवाड़ में पाली गाँव बसाया, जो वर्तमान में मारवाड़ मे हैं। 11वीं शताब्दी में पाली (गुजरात) पर बार-बार यवनों के आक्रमण के बाद पालीवाल ब्राह्मण पाली (मारवाड़) और मेवाड़ में आकर रहने लगे।

हमारे पूर्वजों ने पाली (मारवाड़) जोकि तत्कालीन मेवाड़ का ही हिस्सा होकर गुहिल राजवंश के अधीन था। इस शहर के विकास में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने पाली को वाणिज्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाया। श्री विल्सन द्वारा लिखी पुस्तक ‘भारत कास्ट’ के अनुसार पाली तत्कालीन भारत का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था, जिसमें सबसे बड़ा योगदान पालीवाल ब्राह्मण समुदाय का ही था और लगभग एक लाख पालीवाल पाली में रहते थे और वे सब बहुत अमीर और प्रसिद्ध थे।

मेवाड़ के समस्त पालीवाल ब्राह्मण समाज श्री सरशलजी के ऋणी रहेंगे

पूर्व में उल्लेखित विजयदेवजी तथा इनके पूर्वज अच्छे विद्वान हुए जो व्यापार भी करते थे। उनके पास अथाह संपत्ति थीं। ये दान भी नहीं लेते थे। इनके दो पत्नियां थीं, बड़ी पत्नी के 10 पुत्र और छोटी पत्नी के दो पुत्र थे। उनके 11 पुत्र तो विद्वान हो गए किन्तु सबसे छोटे पुत्र सरशलजी कुछ पढ़-लिख नहीं सके।

पिता के देहावसान के बाद ज्येष्ठ भ्राताओं ने उन्हें जायदाद से वंचित कर दिया। इस व्यथा से उन्होंने पाली छोड़ने का निश्चय किया और शुभ मुहूर्त में पाली से निकलकर सांडेराव गाँव जा पहुँचे। वहाँ यशोभद्रजी आश्रम पहुँचे और सारा वृतांत सुनाया। 12 वर्षों की विद्या के बाद उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि आप मेवाड़ में जाकर राणा के पुरोहित होंगे। उसके पश्चात् वे चिकलवास गाँव में रहने लगे। उन्होंने राणा राहप के कुष्ठ रोग का निवारण किया।

जिससे प्रसन्न होकर उन्हें राजपुरोहित की उपाधि मिली। मेवाड़ राजवंश विश्व के सबसे बड़े राजवंशों में से एक हैं। सरशलजी पर सरस्वती देवी की असीम कृपा थीं। कहा जाता है कि उनका चढ़ाया हुआ भोग माँ सरस्वती स्वयं ग्रहण करती थीं। एक कथा और उनके बारे में प्रचलित है कि वे अपने तपोबल से स्नानोपरांत धोती आकाश की ओर फैलाते तो धोती अपने आप तन कर सूख जाती थी। संपूर्ण मेवाड़ के समस्त पालीवाल ब्राह्मण समाज श्री सरशलजी के ऋणी रहेंगे। जब तक पालीवाल वंश रहेगा, सरशलजी को याद किया जाएगा।

सरशलजी की पूरी वंशावली वीर एवं बुद्धिमान थी। उनको महाराणा ने अपना सेनापति नियुक्त किया था और चिकलवास गाँव का पट्टा एवं जागीर दे दी। उन्होंने ही यहाँ चारभुजाजी का मंदिर बनाया। साथ ही माणक बावड़ी एवं माणक चैक भी बनाये, जो आज भी मौजूद है।

राजपुरोहित देवरामजी बड़े योग्य एवं स्पष्टवादी थे, इसी कारण राजपुरोहिताई छोड़ 

राजपुरोहित देवरामजी बड़े योग्य एवं स्पष्टवादी थे, इसी कारण उन्होंने राजपुरोहिताई छोड़ दी। तेरहवीं पीढ़ी में मेवाड़ के राणा हमीर हुए जो अधिकांश केलवाड़ा (कुशलगढ़) में रहा करते थे। उन्होंने कुंभलगढ़ के समीप एक तालाब बनवाया, जो इस समय हमीर ताल के नाम से विख्यात है। तालाब की वास्तु प्रतिष्ठा के समय सं. 1375 के लगभग राणाजी अपनी उपपत्नी को लेकर बैठे तो राणा के पुरोहित देवराम पालीवाल ने इसका विरोध किया।

उन्होंने कहा कि यदि आप अपनी धर्मपत्नी को लेकर यज्ञ मंडप में नहीं बैठेंगे तो मैं उपपत्नी की उपस्थिति में यह कार्य संपादन कभी नहीं कराउँगा। पुरोहितजी के इस विरोध से उपपत्नी अत्यन्त क्रोधित हुई और उसे क्रोधित देखकर राणा को भी क्रोध आ गया। पुरोहितजी परिस्थिति को देखकर उठ गये और ‘मुझे पुरोहिती की आवश्यकता नहीं है’ कहकर अपने गाँव शीशोदा चले गये। राणाजी ने प्रतिष्ठा अन्य पंडित से करा ली परंतु बाद में पश्चाताप हुआ और वे पुरोहित को मनाने स्वयं शिशोद ग्राम आये।

पुरोहित देवराम के कोई लड़का नहीं था। उनके छोटे भाई के तीन लड़के थे। बड़ा राजुल, मझला बेजल तथा छोटा भोजल। राजुल की इच्छा राजपुरोहित बनने की थी। जिस समय राणा हमीर के शिशोद ग्राम आने की सूचना मिली, राजुल ने पुरोहित देवराम को कहकर धोखा दिया कि आपने प्रतिष्ठा के अवसर पर राणाजी की निंदा की, इसलिए राणाजी आपको मारने के लिए आ रहे हैं। राजुल के कथन पर विश्वास करके देवराम ने कटार मारकर आत्महत्या कर ली।

किन्तु जब राणाजी को सब बातें मालुम हुईं तो उन्होंने राजुल को धिक्कारा और पुरोहित के स्थान पर बैजल को नियुक्त कर दिया। बड़े भाई राजुल के वंश में से मेवाड़ के बड़े भाणुजा ग्राम के पालीवाल हैं। मझले भाई बैजल के वंश में धांयला, गुड़ला, धनवल, कुंठवा, बागोल आदि गांव हैं। छोटे भाई भोजल के वंश में खमनोर, जावद, मोरवड़ आदि ग्राम हैं।

खमनोर में चारभुजानाथ का मंदिर बनवाया और बड़े भाई राजुल ने बड़ा भाणुजा में लक्ष्मीनारायण का मंदिर बनवाया

तेरहवीं शताब्दी में ही राज पुरोहित बैजल के छोटे भाई भोजल ने खमनोर में चारभुजानाथ का मंदिर बनवाया और बड़े भाई राजुल ने बड़ा भाणुजा में लक्ष्मीनारायण का मंदिर बनवाया। यह दोनों साथ-साथ बने और दोनों की प्रतिष्ठा का मुहूर्त एक ही दिन आया। मुहूर्त आगे-पीछे रखने को परस्पर बहुत कहा सुना गया किन्तु किसी ने नहीं माना और दोनों मंदिर की प्रतिष्ठा एक ही दिन की गई। मेवाड़ के समस्त पालीवाल दोनों ओर से बुलाये गये थे। अंत में उस बुरे दिन समाज को दो भागों में बांट दिया जो आज तक मौजूद है। भाणुजा में 44 गांव तथा खमनोर में 24 गांव के पालीवाल हो गये, वह श्रेणी आज तक चली आ रही है। इसी कारण ये 44 खेड़े और 24 खेड़े वाले कहलाने लगे। भाणुजा पहले एक था पर राजड़जी, वेजड़जी के कारण दो भाणुजे हो गए, जो वेजड़जी के साथ रहने वाले बड़े पालीवाल कहलाए एवं राजड़जी के साथ रहने वाले छोटे पालीवाल कहलाए। मूलतः ये सब एक ही हैं।

मेवाड़ राज्य का प्रथम राज पुरोहित बैजल 

जब मेवाड़ के महाराणा हमीर हुए तो पालीवाल पुरोहित मेवाड़ के राजपुरोहित हो गये। मेवाड़ राज्य का प्रथम राज पुरोहित बैजल थे। संवत् 1396 ई. के आसपास महाराणा हमीर ने चित्तौड़ के किले में कुकड़ेश्वर कुण्ड के पास अन्नपूर्णा का मंदिर बनवाया, उसके पुजारी पालीवाल ही बनाये गये, जिनके वंशज आज तक यहाँ के पुजारी हैं। मेवाड़ में बसने वाले पालीवालों ने मेवाड़ की आन-बान को सुरक्षित रखने के लिए अपनी परंपरानुसार अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

इतिहासकारों ने मेवाड़ में बसने वाले पालीवालों को उपयुक्त स्थान प्रदान नहीं किया

जहाँ अन्य जातियां अपने व्यासायिक लाभों को साधने में लगी रही, वहीं पालीवाल समुदाय ने अपने रक्त से मेवाड़ की धरा को सींचकर संपूर्ण भारतवर्ष में मेवाड़ राजवंश को सिरमौर बनाने का सदैव प्रयास किया लेकिन इतिहासकारों ने मेवाड़ में बसने वाले पालीवालों को उपयुक्त स्थान प्रदान नहीं किया तथा भावी पीढ़ियों ने भी अपने बढ़ेरों के गौरवशाली योगदान को विस्मृत कर दिया, जिस कारण कई ऐसे गौरवशाली ऐतिहासिक पृष्ठ सर्वजन के समक्ष प्रस्तुत नहीं हो पाये। यह पालीवाल ही थे जिन्होंने मेवाड़ की सीमाओं का निर्धारण कराया तथा मेवाड़ का अन्य देशीय राजतंत्रों के साथ कूटनीतिक एवं सामरिक सामंजस्य स्थापित करा मेवाड़ राजवंश को अग्रणी स्थान दिलाया।

पालीवाल समाज को विश्व के सबसे पुराने राजवंश का राजपुरोहित होने का गौरव 

जहां विश्व के सबसे पुराने राजवंश का राजपुरोहित होने का गौरव पालीवाल समाज को है तो वहीं ऐसी उत्कृष्ट जाति का राजपुरोहित होना भी राजवंशीयों के लिए गौरव से कम नहीं। अगर इतिहास उठाकर देखें तो मरुधरा के चाहे जोधपुर हो, जैसलमेर हो या मेवाड़ हो इन सभी राज्यों के उत्कर्ष में पालीवालों ने अतुलनीय योगदान दिया है लेकिन उन समस्त योगदान का यहां उल्लेख करना संभव नहीं है, इसलिए केवल संक्षिप्त में जानकारी देने के आशय से यहां यह संक्षिप्त इतिहास आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। भविष्य में यदि समाजजनों का आशीर्वाद, सहयोग रहा तो पालीवाल समाज का विस्तृत इतिहास भी अवश्य प्रकाशित किया जायेगा।

पाली, मारवाड़ : पूर्व में पाली (मारवाड़) के बारे में उल्लेख किया था। जब मेवाड़ में पालीवाल पलायन करके बस रहे थे तब तत्कालीन पाली में पालीवालों की सभ्यता उत्कर्ष पर थी लेकिन समय के साथ पालीवालों में विलासिता, राग-द्वेष बढ़ने लगा। पाली के अंतिम नरेश यशोधन भी भोग विलास में लिप्त हो गये।

 यवनों का एक बहुत बड़ा हमला पाली पर हुआ : पाली का पतन...!

जब पालीवाल अपनी रक्षा मीना मेर जैसी जाति के लोगों से जो पाली में आकर लूटपाट करने लगे थे, करने में असमर्थ हो गये तो उन्होंने बारहवीं शताब्दी में राव सिंहाजी राठौड़ से रक्षा की प्रार्थना की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। कुछ ही वर्ष बाद यवनों का एक बहुत बड़ा हमला पाली पर हुआ।

संवत् 1330 ई. के कार्तिक मास में बिहुगांव के युद्ध में राव सिंहाजी वीरगति को प्राप्त हुए और इस युद्ध में पालीवालों ने भी पूरी शक्ति के साथ भाग लिया किन्तु वे हार गये और पाली का पतन हुआ। कहते हैं कि उस दिन गौरी शाह बादशाह ने गायें कटवाकर तालाब में डाल दी थीं। युद्ध भूमि में मारे गये पालीवालों के शरीर से 9 मन जनेऊ निकली और जो स्त्रियाँ सती हुई थीं, उनके चूड़ों का वजन 84 मन था, जो हाथी दाँत के थे।

पाली छोड़ने को विवश होना पड़ा : पाली पतन के बाद यवन सेनानायकों ने इस्लाम कबूल करने के लिए आदेश दिया, किन्तु स्वाभिमानी पालीवालों ने अपनी अतुल संपत्ति को तिलांजलि देना कबूल किया, किन्तु धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि उन्हें पाली छोड़ने को विवश होना पड़ा। वे पाली से निकल पड़े। कुछ लोगों का इरादा जैसलमेर जाकर बसने का था, किंतु यहाँ उनमें मतभेद हो गया। अतः जिन्हें जैसा उचित जान पड़ा, उस ओर वे चले गये। इस प्रकार वृहद पालीवाल समाज के कई टुकड़े हो गये और वे जैसलमेर, जोधपुर, उदयपुर, गुजरात आदि स्थानों में बिखर गये।

लगभग 20 प्रतिशत लोग मेवाड़ में आकर बस गये जो 12वीं शताब्दी के अंत से ही यहाँ निवास कर रहे हैं। जो लोग जैसलमेर गये, उनकी गाथा पीछे है :

मेरा कोई भी उत्तराधिकारी इनका कर बढ़ाने या इनकी जमीन मकान आदि छीनने का अधिकारी नहीं होगा

जैसलमेर जाने वाले दल का वृतांत सुनकर दयालु नरेश ने उनका स्वागत किया और राजकोष से सहायता देने की इच्छा प्रकट की, किन्तु इन लोगों ने धन न लेते हुए मेहनत करके जीवनयापन करने का निर्णय लिया और जमीन की मांग की। राजा ने इच्छानुसार भूमि पसंद कर अपने अधिकार में कर लेने की आज्ञा दे दी और राजा ने उनको एक ताम्रपत्र इस आशय का लिख दिया कि मेरे राज्य में रहने वाले पालीवाल ब्राह्मणों से भूमि कर, जो अन्य लोगों से लिया जाता है, उसमें पंचमांश लिया जावे। मेरा कोई भी उत्तराधिकारी इनका कर बढ़ाने या इनकी जमीन मकान आदि छीनने का अधिकारी नहीं होगा।

इस तरह सैकड़ों वर्षों तक पालीवाल ब्राह्मण कुलधरा, जैसलमेर में मानपूर्वक जीवन निर्वाह करते रहे। स्वयं राजा अपने राजकार्य में पालीवाल नेताओं और विद्वानों की सम्मति लेकर ही कार्य करते थे। इससे कुछ दरबारीईर्श्या, जलन करने लगे और षड़यंत्र रचने लगे। अंत में वे फल हुए और पालीवालों पर कर भार बढ़ा दिया गया, जिससे उनकी प्रतिष्ठा पर आघात हुआ।

एकाएक पूरे गांवों का एक साथ गायब हो जाना आज भी लोगों के आश्चर्य 

कुलधरा - पालीवाल ब्राह्मणों की विरासत :-19वीं सदी में पालीवाल ब्राह्मणों के 85 गाँव कुलधरा में शामिल थे। 1291 ई. से बसे ग्रामीणों के सात शताब्दियों के बाद एकाएक पूरे गांवों का एक साथ गायब हो जाना आज भी लोगों के आश्चर्य का कारण हैं। उस समय सत्तारूढ़ राज्य में एक मंत्री थे। जिनकी गंदी नजर गांव के प्रमुख की छोटी बेटी पर थी। वह उसके साथ शादी करना चाहता था लेकिन प्रमुख ने मंत्री को इनकार कर दिया। सन् 1825 ई. में 85 गांवों में से एक रात सभी प्रमुखों ने बहुत अंधेरी रात में उनके गर्व और सम्मान के लिए कुलधरा छोड़ने का फैसला लिया। वे गांव छोड़ने के बाद कहाँ गये, किसी को पता नहीं चला। कहा जाता है कि कुछ लोग मेवाड़, बीकानेर, जोधपुर आदि की ओर तथा कुछ कच्छ, भुज की ओर चले गये।

पालीवाल समाज ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा

अंत में, पालीवाल केवल एक जाति नहीं, अपितु एक संस्कृति है, एक जीवन पद्धति है, जिसके अपने कुछ उत्कृष्ट मानक हैं। इतिहास पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि पालीवाल समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों के उच्चतम गुण हैं। पालीवाल समाज ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा। अपनी जीवटता के गुण के कारण ही इतनी बार अपना सर्वस्व त्याग दिया। अपने धर्म और सम्मान के लिए, फिर से स्वयं को उच्चतम शिखर पर पदस्थापित किया। उपरोक्त इतिहास संक्षिप्त रूप से सभी समाजजनों के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। इस इतिहास में अभी और अनुसंधान की आवश्यकता है तथा कई तथ्य हैं जो मजबूरीवश यहां प्रस्तुत नहीं किए जा सकते, अतः भविष्य में पालीवाल समाज पर विस्तृत प्रकाशन किया जाना प्रस्तावित है।

संकलनकर्ता : सुरेश चन्द्र पालीवाल, एडवोकेट

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