समर्पण के आधार पर ही अद्वैत के रूप में परिणत हुआ जाता है। ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाकर उसके संकेत और निर्देशों को ही अपनी आकाँक्षा और क्रिया में जोड़ देना, इसी का नाम समर्पण है, मिलन की साधना इसी से पूरी होती है। अपनी इच्छाओं को पूरी करने के लिए ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाना और नाक रगड़ना, भला यह भी कोई भक्ति है? लोभ और मोह की पूर्ति के लिए दाँत निपोरना भला यह भी कोई प्रार्थना है?
इस प्रकार की भक्ति को वेश्यावृत्ति ही कहा जा सकता है। भौतिक स्वार्थ के लिए किए गए क्रिया-कलापों को ईश्वर के दरबार में भक्ति संज्ञा में नहीं गिना जा सकता। वहाँ तो भक्त की कसौटी यह है कि किसने अपनी कामनाओं और वासनाओं को तिलांजलि देकर ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाया और उसकी मर्जी के अनुरूप चलने के लिए कठपुतली की तरह कौन तैयार हो गया ? जो इस कसौटी पर खरा उतरता है- वही भक्त है।
भक्त भगवान को अपनी मर्जी पर चलाने के लिए विवश नहीं करता, वरन् उसकी इच्छा से अपनी इच्छा मिलाकर अपनी विचार प्रणाली एवं कार्य-पद्धति का पुनर्निमाण करता है, तब उसके सामने इस विश्व को अधिक सुन्दर, अधिक समुन्नत और अधिक श्रेष्ठ बनाने की ही एकमात्र इच्छा शेष रह जाती है।
अपने आपको काया की तथा परिवार की तुच्छता में आबद्ध नहीं करता, वरन् सबमें अपनी आत्मा को और अपनी आत्मा में सबको समाया हुआ समझ कर लोकमङ्गल के लिए जीता है और वसुधैव कुटुम्बकम् के अनुरूप अपनेपन की परिधि अति व्यापक बना लेता है। तब उसे अपनी काया ईश्वर के देव मंदिर जैसी दीखती है और अपनी संपदा ईश्वर की पवित्र अमानत जैसी, जिसका उपयोग ईश्वरीय प्रयोजन के लिए किया जाता है।
इन मान्यताओं को अन्तःकरण में गहन श्रद्धा की तरह प्रतिष्ठापित कर लेने वाला व्यक्ति भक्त है। उसे ईश्वर दर्शन के रूप में किसी अवतार या देवता की काल्पनिक छवि को आँख से दीख पड़ने की बाल-बुद्धि उठती ही नहीं। वह उसे दिवास्वप्न मात्र मानता और निरर्थक समझता है। उसका ईश्वर दर्शन अधिक वास्तविक और बुद्धि सङ्गत होता है।