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प्राचीन सीतामाता अभयारण्य में मिले आदिमानव कालीन शैल चित्र

ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग Published by: paliwalwani Updated Fri, 10 Jul 2026 12:29 AM
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चन्द्र शेखर मेहता

प्रतापगढ़.

प्रतापगढ़ के जंगलों में आदिमानव कालीन शैल चित्रों की खोज वर्षों के कड़े वन अन्वेषण अभियानों का परिणाम है। पर्यावरणप्रेमी मंगल मेहता की वर्षो की मेहनत से मिली  यह खोज साबित करती है कि हमारा प्रतापगढ प्रागैतिहासिक काल में भी मानव सभ्यता और संस्कृति विकास का एक बेहद समृद्ध केंद्र था।

ये चित्र सिर्फ पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां नहीं हैं, बल्कि हजारों साल पुराने हमारे पूर्वजों के जीवन और प्रकृति के साथ उनके जुड़ाव का जीवंत प्रमाण हैं। प्रशासन, सरकार और पुरातत्व विभाग से इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। इस पर आगे रिसर्च की जाए।

सरकार से अंवेषण की आस : दो वर्ष से सीतामाता अभयारण्य के मगरो, पहाडो, गुफाओ मे मेहता को घूम घूम कर ढूंढने से दस स्थानों पर जैव विविधता और प्रागैतिहासिक साक्ष्य मिले है। जो प्रतापगढ़ जिले ही नहीं, राजस्थान की बड़ी उपलब्धि है l सीतामाता जंगल में आदिमानव के शैलचित्र और आश्रय स्थल मिले है l 

इन जंगलों में हाल ही में एक और आदिमानव शैलचित्र स्थल मिला है। कांठल क्षेत्र में जैव विविधता और प्रागैतिहासिक साक्ष्यों की खोज के दौरान पर्यावरणप्रेमी मंगल मेहता गत दो वर्ष में अब तक दस से अधिक पुरास्थलों की पहचान कर चुके हैं, जिनका संबंध आदि मानवों से बताया जा रहा है। 

इतनी मेहनत के बाद अब सरकार से अंवेषण की आस है। जिससे यहां के पुरातात्विक स्थलों की विस्तृत जानकारी सामने आ सके। शैलाश्रयों में वन्यजीव, शिकार दृश्य, पालतू पशु, नृत्य, घुड़सवार सैनिक, रंगोली और ज्यामितीय आकृतियां प्राकृतिक रंगों से

उकेरी गई हैं। एक शैलाश्रय में पांडवों से जुड़े चित्र भी मिले, जिसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खोज के दौरान नई रॉक पेंटिंग्स दिखाई दीं। समय के खोज प्रभाव से ये चित्र काफी धुंधले हो चुके है और कुछ आकृतियां स्पष्ट नहीं  हैं। लाल रंग संभवतः गेरू या लाल मिट्टी मे  कुछ ज़डी बूटियों से बनाया गया प्रतीत होता है, जिसमें ज्यामितीय आकृतियां प्रमुख है।

गत कुछ कुछ वर्षों से पर्यावरणविद् मंगल मेहता जिले की प्रागैतिहासिक विरासत को सामने ला रहे हैं। इन स्थलों के संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे है, लेकिन जिम्मेदार विभाग ने अब तक ध्यान नहीं दिया।

गौरतलब है कि पुरातत्व के कुछ विश्वविद्यालय छात्र भी अध्ययन के लिए प्रतापगढ़ आए, जिन्हें उचित सहयोग मिलने पर यह खोज और आगे बढ़ सकती है।

कई स्थानों पर पहली बार खोज : प्रतापगढ़ जिले में मेहता ने पहले भी पीपलखूंट, धरियावद और आसपास के जंगलों में कई आदिमानव काल के शैलचित्रों, स्टोन टूल्स आदि की पहली बार खोज की है l  

यदि संरक्षण नहीं हुआ तो मिट सकते हैं ये साक्ष्य l 

प्रतापगढ़ के जंगलों में आदिमानव कालीन शैल चित्रों की खोज वर्षों के कड़े वन अन्वेषण अभियानों का परिणाम है। पर्यावरणप्रेमी मेहता के अनुसार यह खोज साबित करती है कि हमारा प्रतापगढ प्रागैतिहासिक काल में भी मानव सभ्यता और संस्कृति विकास का एक बेहद समृद्ध केंद्र था। ये चित्र सिर्फ पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां नहीं हैं, बल्कि हजारों साल पुराने हमारे पूर्वजों के जीवन और प्रकृति के साथ उनके जुड़ाव का जीवंत प्रमाण हैं। प्रशासन, सरकार और पुरातत्व विभाग से इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने के लिए तुरंत ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। इस पर आगे रिसर्च की जाए।

उल्लेखनीय है कि मंगल मेहता ने सीतामाता अभयारण्य पर कई आलेख प्रकाशित किए है l "marvelous kanthal " पुस्तक का भी प्रकाशन हुआ, जिस का विमोचन राजस्थान सरकार के केबिनेट मन्त्री राजस्व हेमन्त मीना ने किया था l

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