छत्तीसगढ़. हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दो बडे मामलों पर अपना फैसला सुनाया है। दोनों ही मामले पुलिस विभाग से जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही गृहमंत्री विजय शर्मा और डीजीपी छत्तीसगढ़ अरुण देव गौतम की कार्यशैली कटघरे में खड़ी हो गई है। क्योंकि कहीं न कहीं पुलिस विभाग का मुखिया होने के नाते विजय शर्मा और गौतम की जिम्मेदारी बनती है कि वह विभागीय कार्यों में पारदर्शिता पर ध्यान दें और अनियमित कार्यों को बढ़ावा न दें।
छत्तीसगढ़ में हुए बड़े एंटी नक्सल ऑपरेशन में साहसिक भूमिका निभाने वाले पुलिस जवानों को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देने में भेदभाव करने का आरोप लगा है। इस आपरेशन में शामिल 03 जवानों को प्रमोशन का लाभ नहीं दिया गया। दायर याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने DGP को दो महीने के भीतर निराकरण करने का आदेश दिया है। दरअसल, कांकेर जिले में पदस्थ पुलिस जवान दीपक कुमार नायक, अग्नु राम कोर्राम और संगीत भास्कर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। जिसमें उन्होंने बताया कि 15 और 16 अप्रैल 2024 को बीएसएफ के साथ संयुक्त रूप से चलाए गए। बड़े एंटी नक्सल ऑपरेशन में तीनों जवान शामिल थे। यह ऑपरेशन कांकेर जिले के कालपर-हापाटोला-छेटेबेठिया क्षेत्र में हुआ, जहां 40-50 सशस्त्र माओवादियों के साथ मुठभेड़ हुई। इस कार्रवाई में 29 सशस्त्र नक्सली मारे गए।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि इस सफल ऑपरेशन में कुल 187 पुलिसकर्मी शामिल थे, लेकिन शासन ने केवल 54 पुलिसकर्मियों को ही पुलिस विनियम 70 (क) के तहत आउट ऑफ टर्न प्रमोशन का लाभ दिया। जबकि, याचिकाकर्ता भी समान परिस्थितियों में ऑपरेशन का हिस्सा थे। इसी भेदभाव से आहत होकर उन्होंने 25 जून 2025 को पुलिस महानिरीक्षक बस्तर रेंज के समक्ष प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया, जो अब तक लंबित है।
हाईकोर्ट ने माना कि, याचिकाकर्ताओं का दावा अभी सक्षम प्राधिकारी के सामने विचाराधीन है। ऐसे में कोर्ट ने इस स्तर पर सीधे पदोन्नति का आदेश न देकर, प्रतिनिधित्व के जल्द निराकरण करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि, पुलिस महानिदेशक याचिकाकर्ताओं के प्रतिनिधित्व पर पुलिस विनियम 70 (क) के अनुसार कानून के अनुसार निष्पक्ष निर्णय लें। यह निर्णय दो महीने के भीतर किया जाए। यदि याचिकाकर्ताओं का मामला उन 54 पदोन्नत पुलिसकर्मियों के समान पाया जाता है, तो उनकी आउट ऑफ टर्न प्रमोशन की प्रक्रिया भी शुरू की जाए। एंटी नक्सल ऑपरेशन अप्रैल 2024 में हुआ। प्रमोशन विवाद और प्रतिनिधित्व (25 जून 2025) के समय DGP अरुण देव गौतम पद पर थे।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरक्षक भर्ती परीक्षा पर रोक लगा दी है। कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को होगी। भर्ती में गड़बड़ी को लेकर याचिका लगाई गई थी। भर्ती में गड़बड़ियों को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने 06 हजार पदों पर हो रही आरक्षक भर्ती के तहत नई नियुक्तियों पर अंतरिम रोक लगा दी है। दरअसल, पुलिस विभाग की ओर से प्रदेश के सभी जिलों में आरक्षकों के रिक्त पदों को भरने के लिए लिखित एवं शारीरिक दक्षता परीक्षा आयोजित की गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भर्ती प्रक्रिया पूरे प्रदेश के लिए एक ही सेंट्रलाइज्ड विज्ञापन के माध्यम से संचालित की जा रही है और सभी जिलों में शारीरिक परीक्षा कराने वाली आउटसोर्स कंपनी भी एक ही है। जिसमें शारीरिक दक्षता परीक्षा, लिखित परीक्षा और दस्तावेज़ सत्यापन शामिल थे। हालांकि नियुक्ति पत्र जारी किए गए, लेकिन कई अभ्यर्थियों ने अनियमितताओं और पक्षपात के आरोप लगाए।ऐसे में आशंका जताई गई कि बिलासपुर की तरह राज्य के अन्य केंद्रों पर भी धांधली हुई हो सकती है। इस पूरे विवाद में यह सवाल उठता है कि DGP के रूप में वरिष्ठ अधिकारी अरुण देव गौतम की जिम्मेदारी क्या थी। DGP पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी होते हैं। भर्ती प्रक्रिया में उनका प्रशासनिक और निगरानी का दायित्व है।
कुल 6 हजार पदों में से अब तक लगभग 2,500 उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी किए जा चुके हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस आरक्षक भर्ती 2025 का आवेदन ऑनलाइन 05 अगस्त 2025 से शुरू हुआ था और इसका आख़िरी दिन 27 अगस्त 2025 तय किया गया था। अरुण देव गौतम को 04 फरवरी 2025 को छत्तीसगढ़ का कार्यवाहक DGP नियुक्त किया गया था। कानूनी रूप से वे सीधे घोटाले के आरोपी नहीं हैं। हाईकोर्ट द्वारा जारी नियुक्तियों पर रोक और अगली सुनवाई यह सुनिश्चित करेगी कि योग्य उम्मीदवारों को सही अवसर मिले और नियमों का पालन हो।
दूसरा महत्वपूर्ण फैसला पुलिस आरक्षक भर्ती से संबंधित है, जिसमें लगभग 6 हजार पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया चल रही थी। अनियमितताओं और संभावित पक्षपात के आरोपों के बाद अदालत ने नई नियुक्तियों पर अंतरिम रोक लगा दी। भर्ती प्रक्रिया राज्यभर में एक केंद्रीकृत विज्ञापन और एक ही आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से संचालित की गई थी। लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षण और दस्तावेज सत्यापन जैसे चरण पूरे होने के बाद भी कई अभ्यर्थियों ने प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए।
करीब 2,500 नियुक्ति पत्र जारी होने के बावजूद अदालत का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि भर्ती केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसर का विषय है। छत्तीसगढ़ में आए ये दो फैसले उसी मानक की पुनर्स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। अब निगाहें प्रशासनिक निर्णयों और आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि न्याय का संदेश व्यवहार में कितना उतरता है।