अनिल सक्सेना 'ललकार'
मामले से जुड़ी सामने आई जानकारी के अनुसार, जिस भूमि को प्रशासनिक तौर पर कथित रूप से सरकारी बताया जा रहा है, उस पर एक आम नागरिक का कब्ज़ा है। इसी संदर्भ में यह आरोप सामने आया कि तहसीलदार द्वारा स्वयं को उस भूमि का “मालिक” बताए जाने जैसी बात कही गई और बातचीत के दौरान निर्वाचित विधायक के साथ अमर्यादित व्यवहार हुआ। इन तथ्यों की अंतिम पुष्टि भले ही जांच का विषय हो, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह पूरा घटनाक्रम प्रशासनिक आचरण पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
सबसे पहला और बुनियादी सवाल भूमि स्वामित्व का है। भारतीय कानून में सरकारी भूमि का स्वामित्व राज्य के पास होता है, किसी अधिकारी के पास नहीं। तहसीलदार की भूमिका एक प्रशासनिक संरक्षक की होती है जो राजस्व रिकॉर्ड देखता है, प्रक्रिया लागू करता है और कानून के अनुसार कार्रवाई करता है। यदि कोई अधिकारी कथित सरकारी भूमि को अपना बताने जैसा दावा करता है, तो वह कानूनी रूप से असंगत है। ऐसा कथन अपने-आप में आपराधिक अपराध न भी बने, लेकिन यह सेवा आचरण नियमों के उल्लंघन और प्रशासनिक विवेक की कमी का संकेत अवश्य देता है।
दूसरा अहम पहलू है कब्ज़ा और वैधानिक प्रक्रिया। कानून यह मानता है कि कब्ज़ा मालिकाना हक़ नहीं देता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बिना विधिसम्मत प्रक्रिया किसी नागरिक को उसकी जगह से हटाया नहीं जा सकता। यदि भूमि वास्तव में सरकारी है, तो कार्रवाई का रास्ता नोटिस, सुनवाई और वैधानिक आदेश से होकर जाता है न कि व्यक्तिगत दावों, दबाव या शक्ति प्रदर्शन से। प्रशासन का काम डर पैदा करना नहीं, बल्कि कानून का पालन सुनिश्चित करना है।
तीसरा और सबसे संवेदनशील मुद्दा है निर्वाचित जनप्रतिनिधि के साथ व्यवहार। विधायक जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि होता है। प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि के बीच मतभेद हो सकते हैं, बहस हो सकती है, लेकिन असभ्य भाषा या बदतमीजी लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन है। जब कोई अधिकारी विधायक से अमर्यादित व्यवहार करता है, तो वह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं करता, बल्कि उस जनता की आवाज़ को ठेस पहुँचाता है, जिसने उस प्रतिनिधि को चुना है।
यह सवाल केवल दौसा की एक घटना तक सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे मामले सामने आए हैं, जहाँ प्रशासनिक अधिकारियों के व्यवहार को लेकर जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों में असंतोष देखने को मिला है। यह कहना न तो उचित होगा और न ही तथ्यपरक कि पूरा प्रशासन बेलगाम है, लेकिन यह चिंता वास्तविक है कि कुछ अधिकारी अधिकार और उत्तरदायित्व की सीमा रेखा भूलते नज़र आ रहे हैं।
जब प्रशासनिक शक्ति संवाद और कानून की भाषा के बजाय अहंकार या कठोरता में व्यक्त होने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ता है। अधिकारी सरकार के सेवक होते हैं, वे कानून से बंधे होते हैं, न कि कानून के स्वामी। “मैं मालिक हूँ” जैसी भाषा, खासकर कथित सरकारी भूमि के संदर्भ में, प्रशासनिक प्रशिक्षण और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े करती है।
ललकार अख़बार का स्पष्ट मत है कि इस पूरे प्रकरण में किसी को पहले से दोषी ठहराना न तो उचित है, न लोकतांत्रिक। लेकिन उतना ही ज़रूरी है कि स्पष्ट, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो। जिला प्रशासन और राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि भूमि से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किए जाएँ, सीमांकन, नोटिस और कार्रवाई की पूरी प्रक्रिया सामने रखी जाए, यदि सेवा आचरण नियमों का उल्लंघन हुआ है तो विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, और यह भरोसा दिया जाए कि प्रशासन जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों दोनों के प्रति जवाबदेह है।
दौसा का यह मामला याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता, बल्कि व्यवहार, भाषा और मर्यादा से चलता है। जब अधिकारी कानून से ऊपर बोलने लगें और जनप्रतिनिधि अपमानित महसूस करें, तो नुकसान अंततः जनता का ही होता है।
ललकार किसी व्यक्ति के खिलाफ़ नहीं, ललकार उस सोच के खिलाफ़ है जो खुद को कानून से ऊपर मानने लगे। क्योंकि सवाल जमीन का नहीं सवाल ज़िम्मेदारी, जवाबदेही और लोकतंत्र की आत्मा का है।#ललकार