● सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
एक बार बाबूजी लाभचंदजी छजलानी ने बताया था कि इंदौर में आजादी के आंदोलन को लेकर कभी उग्र घटनाक्रम नहीं हुआ। बाबूजी बोले मुझे याद है कि 1926 में इंदौर में हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ था। शायद इंदौर के इतिहास में यह पहला दंगा था। इंदौर के कलेक्टर बलवंतसिंह थे। उनके यहां जनेऊ का कार्यक्रम चल रहा था। तभी नयापुरा में जुलूस निकल रहा था, जहां से पथराव शुरू हुआ।
बलवंत सिंह भी एक कट्टर आदमी थे। उनके साथ एक आदमी था बलवंता। इंदौर का नामी गुंडा था। उसको लेकर कोई झगड़ा हो गया था। बलवंत सिंह के साथ बलवंता भी साथ में था। यह महाराजा तुकोजीरावजी के जमाने की बात है। बलवंता पहलवानी करते थे।
1926 में हिंदू मुस्लिम दंगा साम्प्रदायिक था, ऐसा कम लोग मानते थे। यह राष्ट्रीय भावना बढ़ाने वाला दंगा था, ऐसा लोग मानते थे। इससे इंदौर में राष्ट्रीय भावना जागृत होने लगी थी, क्योंकि मुस्लिम लीग ने अलग देश की मांग करना शुरू कर दी थी। चर्चा में यह विचार होने लगा था, राष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदू- मुस्लिम दो अलग देश हैं, ये एक साथ नहीं रह सकते।
इस विचार के चलते इंदौर में 1926 में दंगा हुआ। इसलिए इस दंगे को सांप्रदायिक न कहकर राष्ट्रीय दंगे के रूप में कहा जाता था। राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने वाला खासकर हिंदुत्व के नाम पर जो राष्ट्रवाद की भावना थी, उसको जगाने वाला, इंदौर में भी यह पहला उग्र आंदोलन या उग्र दंगा हुआ था।
1926 के बाद से छोटा-मोटा दंगा फिर हुआ ऐसा रिकार्ड नहीं मिलता। बाबूजी ने बताया 1926 का दंगा तूफानी दंगा था। इसके दूसरे दिन भी यह भड़कता रहा। एक गंगाराम पहलवान थे, उन्हें किसी ने छुरा मार दिया था। यह उसी दिन की बात है जिस दिन भगतसिंह को फांसी हुई थी और इंदौर में जुलूस निकल रहा था।
तब दंगे की वजह से सभी दुकानें बंद हो गई थी। जगह-जगह मीटिंगें हो रही थीं। लोग काफी दुखी थे।भगत सिंह के फांसी होने से लोगों में उग्र भावना भड़क रही थी। इसी नाराजी ने एक नया रूप ले लिया। तभी गंगाराम पहलवान की हत्या हो गई।