सुबह क्लास में हम छः दोस्त बैठे थे मैं, आर्या शर्मा, संस्कृति शर्मा, भूमि सिंह, सौम्या वारदे और कमलेश कुलमी और न जाने कैसे बीच कन्वर्सेशन में ही किसी ने छेड़ी वो बात जो हम सब के दिल में थी, "चलो कहीं चलते हैं आज!" दो उपाय थे मनुभान टेकरी या भीमबैठका गुफाएँ लेकिन सभी का मन लगभग भीमबैठका की तरफ झुका हुआ था। आँखों में एक ही समय में वो चमक आई जो किसी भी सच्चे एडवेंचरर की पहचान होती है। बात ख़त्म, फ़ैसला हो चुका था और हम सभी 11:30 बजे विश्वविद्यालय से निकल लिए बिना एक पल सोचे
हम लोग कैंपस के बाहर अभी शूटिंग एकेडमी तक भी नहीं पहुँचे थे कि एक बड़ा सा ट्राला पीछे से आता दिखा। छः नज़रें एक साथ पीछे उस ट्रक पर पड़ीं और छः हाथ एक साथ उठ गए लिफ्ट माँगने के लिए। ड्राइवर रुका और बैठ गए सब। हम सभी ट्रक में लिफ्ट मांगकर पहली बार बैठे थे। ट्रक जब नीलबड़ से रातीबड़ वाले रास्ते पर जाने लगा तो गूगल मैप्स से मालूम हुआ कि भाई हम तो सीधे उल्टी दिशा में जा रहे थे! जल्दी से ट्रक रुकवाया, हम उतरे, सड़क पार की और एक छोटे हाथे-रिक्शा में सवार होकर नीलबड़ चौराहा पहुँचे।
यहाँ से शुरू हुआ वो सफ़र जो किसी भी बॉलीवुड रोड़ ट्रिप से कम नहीं था। नीलबड़ से एक स्कूल बस ने लिफ्ट दी और साक्षी ढाबा चौराहा तक पहुँचे। वहाँ से मध्यप्रदेश शासन की एक सरकारी गाड़ी मिली जो वन विहार जा रही थी। थोड़ी बात-चीत, थोड़ी मनुहार, और उन्होंने सैर-सपाटा तक छोड़ दिया। फिर पैदल चल कर हम नेहरू नगर चौराहा, वहाँ से सिटी बस लेकर एमपी नगर बोर्ड ऑफिस तक पहुंचे। वहाँ से मिली वो बस जिसका हम सबको इंतज़ार था जो हमें मंडीदीप के आगे ओबैदुल्लाहगंज तक छोड़ने वाली थी 50 रुपये में। मंडीदीप के पास जब बस रुकी तब कमलेश हम सभी के लिए नज़दीक ही दुकान से फटाफट समोसे लेकर आया। सभी ने उसका लुत्फ़ उठाया। ओबैदुल्लाहगंज से एक ई-रिक्शा मिला और उसने सीधा भीमबैठका के मेन रोड़ तक पहुँचा दिया। रेलवे लाइन क्रॉस की, पैदल चले और वो लम्हा आया जिसका पूरे दिन से इंतज़ार था।
रेलवे लाइन क्रॉस करने के बाद हम पैदल ही ऊपर तक पहुंचे। टिकट काउंटर पर पहुँचे तो वहां काम कर रहे कर्मचारियों ने बताया कि, "यहाँ से आगे पैदल नहीं जा सकते आप। यह रातापानी टाइगर रिज़र्व का इलाका है, कभी भी बाघ आ सकता है।" हमने उन्हें बहुत कहा काफी दूर से आए है स्टूडेंट है हम। आखिर में वह माने और उनकी बाइक देने के लिए राज़ी हो गये जिससे हम ऊपर तक पहुँचे।
बड़े-बड़े पत्थर, हज़ारों साल पुराने रॉक शेल्टर्स उन पर बनी हुई वो प्रागैतिहासिक पेंटिंग्स जो आज भी उतनी ही ज़िंदा हैं जितनी तब थीं जब किसी आदिम इंसान ने अपने हाथों से उन्हें उकेरा था। वहाँ मेरे अंदर का आर्कियोलॉजिस्ट जाग गया था वो हिस्सा जो हिस्ट्री की किताबों में खो जाता है, वो आज इन पत्थरों को छू रहा था। शाम के 3:30 से 4:45 तक खूब फ़ोटो खिंचवाए मस्ती की और वो ख़ामोशी भी साथ थी जो सिर्फ़ किसी यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट ही दे सकती है।
वहां से निकल कर नीचे उतरे, रेलवे लाइन क्रॉस की और जैसे ही मेन रोड़ पर क़दम रखा। एक बस आई जिसने हमें सीधे आईएसबीटी भोपाल तक उतार दिया। एक पल लगा जैसे सफ़र ने ख़ुद मेहरबानी की हो। एक घंटे में आईएसबीटी पहुँचे फिर बंसल वन वाली बिल्डिंग के नीचे फूड कोर्ट में एक कैफे में सब बैठ गए। उस वक़्त जो खाना खाया, वो सिर्फ़ खाना नहीं था, वो उस पूरे दिन की दावत थी।
फिर वो वक़्त आया जब रास्ते अलग हो गए। सौम्या उसके एमपी नगर वाले पीजी की तरफ़ निकल गई। संस्कृति और भूमि नेहरू नगर की तरफ़। मैं, आर्या और कमलेश कमलेश सिटी बस में बैठ गए नीलबड़ के लिए। नीलबड पर कमलेश भी अपने पीजी गया, मैं और आर्या हॉस्टल अपने कैंपस की तरफ निकले। रात के 8 बजकर 24 मिनट पर कैंपस में क़दम रखा।
बहुत थकान थी लेकिन वो वाली थकान जो अपने साथ एक मुस्कान लेकर आती है। जेब से पैसा ज़्यादा नहीं गया, प्लान कुछ था नहीं, लेकिन जो मिला वो बेहिसाब था।ज़िंदगी के बेहतरीन दिन वो नहीं होते जिन्हें हम प्लान करते हैं बल्कि वो होते हैं जो अचानक सिर्फ हो जाते हैं।