-सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
आदरणीय बाबू लाभचंदजी छजलानी मध्यभारत के समय और मध्यप्रदेश निर्माण के बाद भी किंग मेकर की भूमिका में थे। वे कांग्रेस पार्टी के अप्रत्यक्ष रूप से कर्ताधर्ता माने जाते थे। राजनीति में उनका बड़ा दखल था। लोग कहते थे कि वे किंग मेकर हैं, वे सरकार बनाने और बिगाड़ने का काम आसानी से कर लेते थे। एक चिंता उनके सहयोगियों में खासकर आदरणीय नरेंद्र तिवारीजी को हमेशा रहती थी कि यदि बाबूजी राजनीति पर इतना ध्यान देंगे तो अखबार आगे तो बढ़ जाएगा और उस पर एक पार्टी का ठप्पा लग जाएगा।
अखबार को याने नई दुनिया को राजनीति से दूर रखा जाए। वह किसी राजनीतिक दल विशेष का अखबार ना रहे, इसके लिए उन्होंने बार-बार बाबूजी से आग्रह किया। आदरणीय तिवारीजी को इस पर गर्व रहा कि बाबूजी को इस बात के लिए सहमत कर लिया कि अखबार को राजनीति से दूर रखेंगे। यह बात स्वयं आदरणीय बसंतीलालजी सेठिया ने एक बार कही थी। इस पर आदरणीय नरेंद्र तिवारीजी ने भी अपनी ओर से कहा था कि यदि बाबूजी और भैयाजी यह मानते हैं कि मैंने अखबार के हित में काम किया है तो मुझे कोई हर्ज नहीं है यह कहने में कि बाबूजी मेरी बात को मान गए, इसकी मुझे बहुत खुशी है।
जहाँ तक मध्य भारत की राजनीति में उनके किंग-मेकर बन जाने का प्रश्न है, उसमें भी उनके स्वभाव का सबसे बड़ा योग रहा। जब नए मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ तो बाबूजी ने कहा कि अब समय बदल गया है। जब तक एक मन से लोग काम नहीं करेंगे, तब तक कोई मिनिस्ट्री सही ढंग से काम नहीं कर सकती। अब लोगों में सेवा के बजाए पद की इच्छा बढ़ने लगी है।
लोग पद के प्रति वफादार हो गए हैं। देश के प्रति वफादारी कम हो गई है, इसलिए अब इनसे इतना ही सम्बन्ध रखना है कि अगर भलाई के काम करवा सकें तो करवा दें, बस। तभी से लाभचंदजी, तिवारीजी और सेठियाजी ने तय किया कि अपने को राजनीति से विच्छिन्नता जाहिर कर देनी चाहिए। स्वतंत्र विचार रखना चाहिए। सेठियाजी बताते रहे कि यह निर्णय करवाने में तिवारीजी कामुख्य हाथ रहा।
मैं भी इस विचार का था, मगर बाबूजी जन्मजात राजनीतिज्ञ थे और अंत तक उनको राजनीति में दिलचस्पी बनी रही। परन्तु चूंकि हमने एक निर्णय कर लिया था, इसलिए वे उससे बँधे थे। बाबूजी ने हम लोगों को यह शिक्षण दिया कि अखबार के पाठक व एजेन्ट हमारे मालिक हैं, हम नौकर। अपन उसके पीछे चलते हैं, क्योंकि अपनी देनदारियां देने वाला आदमी वही है।
इसलिए वह जब आए या उसके घर हम जाएँ या हमारा कोई आदमी जाए तो कभी भी उसका पैसा खर्च नहीं करवाना चाहिए और न इस तरह के दबाव की बात करनी चाहिए कि जिससे उसे यह लगे कि हम मालिकाना रौब जता रहे हैं। यह बाबूजी की सबसे बड़ी विशेषता थी। जितने एजेंन्ट और संवाददाता हमारे यहाँ आते हैं, वे कहते हैं कि हमको इस तरह का व्यवहार कहीं नहीं मिलता।
दूसरी बात यह कि हमारे यहाँ कर्मचारियों की छोटी से छोटी कठिनाई हो, कोई मुसीबत या बीमारी हो, बाबूजी ने कहीं से भी लाकर मदद की व पैसे दिए। बाबूजी ने यह भी कहा था कि कर्मचारी की जब कोई मुसीबत हो तो अपने को कानून का सहारा लेकर उसे दबाना नहीं चाहिए। उनके साथ व्यवहार में अपन को बराबरी रखनी चाहिए।
बाबूजी का राजनीति में या अन्य किसी क्षेत्र में कोई दुश्मन नहीं रहा। यह उनके जीवन की बड़ी उपलब्धि है। व्यक्तिगत जीवन में वे सब के मित्र थे। किसी से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या विरोध चाहे कितना भी रहा हो या राजनीतिक मतभेद रहा हो, परन्तु व्यक्तिगत जीवन में वे सब के मित्र बने रहते थे। सहायता की जरूरत होने पर सहायता करते थे। व्यक्तिगत संबंधों को वे बहुत मधुर बनाए रखते थे। इसी कारण विरोधी भी उन्हें अपना दुश्मन नहीं मानते थे।
विशेषताओं के बारे में एक मुख्य बात यह भी थी कि वे नईदुनिया की प्रतिद्वंद्विता में बिकने वाले किसी अखबार को नापसंद नहीं करते थे। वे हमेशा चाहते थे कि अगर कोई प्रतिद्वंद्वी सामने होगा, तो हमारा अखबार भी उसकी प्रतिद्वंद्विता में गलतियाँ कम करेगा और सुधरने की गुंजाइश ज्यादा रहेगी। वे तो यह चाहते थे कि कोई मुकाबले में अखबार निकले तो बहुत अच्छा निकले, ताकि हमारी उससे स्वस्थ प्रतियोगिता हो।