भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ही संगठन में शामिल कई पदाधिकारियों या उनके परिवार के लोगों को टिकट दिए,सवाल है कि फिर दूसरे कार्यकर्ताआगे कैसे बढ़ेंगे, क्या दोनों पार्टियों पर कुछ लोग ही कब्जा करके रहेंगे
ओम माथुर
भारतीय जनता पार्टी यूं तो सार्वजनिक रूप से परिवारवाद, वंशवाद का विरोध करती है। एक पद एक व्यक्ति के सिद्धांत की वकालत करती है। लेकिन अजमेर नगर निगम चुनाव में बांटे गए टिकटों पर नजर डाली जाए, तो उसने इस बार परिवारवाद और वंशवाद के मामले में कांग्रेस को भी मात दे दी है। खैर,जिला स्तर पर क्या,अब तो राष्ट्रीय स्तर पर भी बीजेपी और कांग्रेस में कोई ज्यादा अंतर नहीं रह गया है,क्योंकि कांग्रेस और दूसरे विपक्ष दलों से नेता आकर भाजपा में बड़े-बड़े पदों पर आसीन हो रहे हैं। कुछ तो मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक बना दिए गए हैं। नेता भी ऐसे -ऐसे जिन पर खुद भाजपा ने करोड़ों -अरबों रुपए के घोटाले के आरोप लगाए थे। ऐसे में नगर निगम में टिकट वितरण में इन सबका होना तो मामूली बात है।
दोनों ही पार्टियों में टिकट वितरण से एक बात और साफ हो गई की पार्टी का टिकट मिलना पार्टी के प्रति, निष्ठा, समर्पण और ईमानदारी नहीं। बल्कि नेता विशेष के प्रति निष्ठा (राजनीति की भाषा में चाटुकारिता और चमचागिरी),उसके प्रति सर्मपण और उसके गुणगान करना है। मैंने पहले भी लिखा था कि वार्ड आरक्षण या अन्य किसी कारण से अगर किसी को खुद को टिकट नहीं मिल रहा था,तो वो अपनी पत्नी,बेटे बेटी के लिए टिकट झपट लाया।
दोनों दलों में स्थिति यह है कि कुछ गिने-चुने लोग ही संगठन और सत्ता में नजर आते हैं। जब संगठन की कार्यकारिणी बनती है तो पद भी उन्हें दिए जाते हैं और जब टिकट बंटने की बारी आती है, तो उन्हें या उनके परिवार को टिकट दिए जाते हैं। जो भारतीय जनता पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मान करने,कैडर बेस और अनुशासित होने का दावा करती है,अजमेर में इस बार उसमें बगावत बडे स्तर पर है। उसने भी इस बार दिल खोलकर ऐसे लोगों को टिकट दिया जो संगठन में भी काबिज है और अब पार्षद बनने के लिए भी मैदान में हैं। तो कोई खुद हटा,तो पत्नी, बेटी के नाम पर राजनीति का कारोबार जारी रखने का लाइसेंस ले आया।
हां, अब राजनीति कोई जनसेवा थोड़ी है। अब यह विशुद्ध रूप से धंधा है। वरना सड़क,नाली, सफाई और बिजली जैसे नगर निगम से जुड़े कामों को कराने के लिए कोई टिकटों के लिए इतनी मारामारी होती क्या। क्या आपको लगता है कि जिन्हें टिकट नहीं मिला,उनकी नाराजगी इस बात से है की वह जनसेवा नहीं कर पाएंगे। उनकी आंखों से आसूं इसलिए निकल रहे, क्योंकि उन्हें दुख है कि वह जनता के बीच नहीं जा पाएंगे। जी नहीं,उनकी नाराजगी ,दुख और बगावती तेवर इस बात से हैं कि उनके हाथ से कमाई का मौका फिसल गया। जो पहले पार्षद रह लिए, वह लक्ष्मीजी की कृपा छोड़ना नहीं चाहते और उनका आर्थिक विकास देखकर कर नए-नए नेता तुरंत टिकट चाहते हैं।
भारतीय जनता पार्टी के शहर अध्यक्ष रमेश सोनी है। वह दो बार से लगातार पार्षद थे। इस बार अपनी पत्नी रंजना सोनी को टिकट दिला दिया। वह भी उस वार्ड से जहां महज 24 सौ मतदाता है और शहर का सबसे छोटा वार्ड है। सतीश बंसल, योगेश शर्माऔर भारती श्रीवास्तव तीनों ही शहर कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष है और तीनों को ही इस बार टिकट मिला है। भारती श्रीवास्तव का यह चौथा लगातार टिकट है।
दो बार वह खुद पहले पार्षद रह चुकी है। जबकि तीसरी बार उनकी बेटी को टिकट दिया गया था। अब वह चौथी बार फिर मैदान में है और दो बार वार्ड बदलकर जीती हैं। उनके पास तीसरा दायित्व महिला मोर्चा के शहर अध्यक्ष का भी है। सतीश बंसल भी पिछले चुनाव में वार्ड नंबर एक से भाजपा टिकट पर चुनाव हारे थे। फिर उन्हें कार्यकारिणी में उपाध्यक्ष बनाया गया और अब टिकट दे दिया गया। शहर महामंत्री राजेश शर्मा है। उनकी पत्नी नलिनी शर्मा वर्तमान बोर्ड में भी पार्षद थी और अब उन्हें फिर टिकट दिया गया है। यानी पति संगठन में और पत्नी सत्ता में।
भाजपा के जिला मंत्री चंद्रेश सांखला 2015 से 20 के बीच खुद पार्षद रहे थे और इस बार उनकी बेटी काश्यवी सांखला को टिकट दिया गया है। शहर कार्यकारिणी उपाध्यक्ष रहे और लगातार दो बार पार्षद रहने वाले स्वर्गीय दीपेंद्र लालवानी के भाई विकास लालवानी को इस बार टिकट दिया गया है। रचित कच्छावा भाजपा के मंडल अध्यक्ष हैं और इस बार पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं। इसी तरह संभाग मीडिया संयोजक अनीश गोयल एक बार फिर मैदान में है। जबकि पहले भी वह पार्षद रह चुके हैं। पूर्व सभापति सुरेंद्र शेखावत ने अपनी पत्नी मधु शेखावत को मैदान में उतारा है।
तो वर्तमान पार्षद की केके त्रिपाठी की बेटी निहारिका त्रिपाठी,निवर्तमान पार्षद मनोज मामनानी की पत्नी रितु मामनानी, प्रियंका सांखला के पिता गंगाराम सैनी व निवर्तमान पार्षद हेमंत सुनारीवाल की पत्नी मंजू को फिर टिकट दिया है। इनके अलावा भी मंडल एवं ब्लॉक स्तर के कुछ पदाधिकारियों को भी टिकट दिया गया है। इनमें से गोविंदराज आर्य मंडल महामंत्री, यतेंद्र शर्मा मंडल मंत्री,वार्ड संदीप मंडल महामंत्री, भोपाल कांत बैरवा भाजपा आईटी सेल जिला संयोजक,मंडल अध्यक्ष उपाध्यक्ष आनंद बढ़ाना की पत्नी मुक्ति बढ़ाना शामिल हैं।
उधर,कांग्रेस ने भी पदाधिकारी उनके रिश्तेदारों को टिकट देने में कसर नहीं छोड़ी है। डीसीसी उपाध्यक्ष नौरत गुर्जर, महासचिवों चंद्रशेखर बालोटिया व तथा ईश्वर राजोरिया की पत्नी काजल शामिल हैं। इसके अलावा डीसीसी सचिव गीता गुर्जर, चंद्रकांत पालीवाल,मंडल अध्यक्ष कमल बैरवा, गणेश चौहान,हमीद चीता, हेमंत जसोरिया की पत्नी गांधारी जसोरिया, चार में से तीन ब्लॉक अध्यक्षों शैलेंद्र अग्रवाल,चंदन सिंह एवं लक्ष्मी धौलखेड़िया को टिकट दिया है। निगम में विपक्षी नेता रही द्रौपदी कोली भी अपने भतीजे को टिकट जलाने में कामयाब रही।
यानी दोनों पार्टियों में जो कार्यकर्ता अपने नेताओं की चिलम भरने में सक्रिय रहे उन्हें या उनके परिवार के लोगों को पहले संगठन में पद मिले और अब पार्षद के टिकट भी मिल गए। ऐसे में सवाल ये है कि पार्टी में दूसरे कार्यकर्ता और नेता आगे बढ़ेंगे कैसे। इसलिए जिन पार्षदों को पहली बार टिकट मिलने की बात की जा रही है, उन पर नजर डाल लीजिए कि वह किसी की पत्नी, बेटी या रिश्तेदार हो सकते हैं।