कैंसर पीड़ित महिला ने दम ही तोड़ दिया, तारीख पर तारीख मिली : 4 साल में 57 बार लिस्ट हुआ केस

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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को जीवन बचाने वाली दवाओं तक पहुंच से जुड़े मामलों में समय पर न्यायिक दखल के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया। यह कदम केरल हाई कोर्ट में ब्रेस्ट कैंसर की पेटेंटेड दवाओं की कीमत से जुड़ी एक याचिका के लंबे समय से लंबित रहने पर ध्यान देने के बाद उठाया गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया गया। मामला 16 जुलाई 2026 को केरल हाई कोर्ट की कार्यवाही में हो रही देरी के बारे में एक पत्र मिलने के बाद दर्ज किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से यह भी अनुरोध किया कि वे लंबित रिट याचिका का जल्द से जल्द निपटारा सुनिश्चित करें।

केरल हाई कोर्ट में यह मामला जून 2022 में शुरू हुआ। ब्रेस्ट कैंसर की एक मरीज ने कोर्ट से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दो पेटेंटेड दवाओं रिबोसिक्लिब (Ribociclib) और एबेमासिक्लिब (Abemaciclib) की कीमत कम करने के उपाय करने की मांग की। इन दवाओं का खर्च महीने में लगभग 1.5 लाख रुपये आता है। रिबोसिक्लिब की कीमत 78,468 रुपये है और एबेमासिक्लिब की कीमत 47,752 रुपये से 95,504 रुपये प्रति माह के बीच है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि केरल हाई कोर्ट में मामला लगभग चार साल तक 57 बार लिस्ट किया गया, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं आया। फैसले का इंतजार करते हुए ही याचिकाकर्ता की मौत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक CJI सूर्यकांत ने कहा कि समस्या केरल हाई कोर्ट की है। इसे 57 बार लिस्ट किया गया। याचिकाकर्ता के पति की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर ने जवाब दिया और उनकी मौत हो गई।

चीफ जस्टिस ने कहा कि शुरू में वे सुप्रीम कोर्ट की ओर से खुद इस मामले को हाथ में लेने से बच रहे थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि शुरू में मैं 'सुओ मोटो' (खुद से) कार्रवाई करने को लेकर हिचकिचा रहा था। मैंने सोचा कि हाई कोर्ट को इस पर कोई राय बनाने दी जाए। लेकिन आखिर में यह बात सामने आई कि मामले पर कोई फैसला नहीं हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, केरल हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मौत के बाद इस मामले को 'सुओ मोटो' जनहित याचिका में बदल दिया था, क्योंकि कोर्ट ने माना कि यह मुद्दा किसी एक याचिकाकर्ता से कहीं ज्यादा बड़ा है।

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