प्रेस की आजादी जरूरी, लेकिन गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता बर्दाश्त नहीं : वकील हड़ताल पर हो सकते हैं, जज और पुलिस नहीं : दिल्ली HC की सख्त टिप्पणी

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दिल्ली. 

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि संसद ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करे, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और पत्रकारिता में जवाबदेही, नैतिकता भी सुनिश्चित हो.

दिल्ली हाईकोर्ट ने पत्रकारिता की बदलती तस्वीर पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि आज के दौर में मोबाइल फोन और माइक लेकर कोई भी खुद को पत्रकार बताने लगता है, जबकि उसके पास न पत्रकारिता की ट्रेनिंग होती है, न नैतिक जिम्मेदारी और न ही किसी तरह की जवाबदेही.

कोर्ट ने कहा कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन इसका इस्तेमाल गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता, लोगों को डराने-धमकाने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने के लिए नहीं किया जा सकता.

वकील हड़ताल पर हो सकते हैं, जज और पुलिस नहीं

जस्टिस कठपालिया ने कहा मैं जानता हूं कि वकील हड़ताल पर हैं, लेकिन न जज हड़ताल पर हैं और न पुलिस हो सकती है. नागरिकों की आजादी से जुड़े मामलों में पुलिस की यह लापरवाही बिल्कुल स्वीकार नहीं की जा सकती. सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को जमानत दे दी.

मीडिया के लिए जवाबदेही वाला कानून बनाने की जरूरत

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा कि अब समय आ गया है कि संसद ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने पर विचार करे, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और पत्रकारिता में जवाबदेही, नैतिकता और कानून का सम्मान भी सुनिश्चित हो. अदालत ने कहा कि मीडिया के पास जनमत बनाने की बड़ी ताकत है, इसलिए उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेस की आजादी लोकतंत्र का एक अहम हिस्सा है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आज मोबाइल और माइक्रोफोन लेकर कोई भी खुद को रिपोर्टर बता देता है, जबकि कई लोगों के पास न तो पत्रकारिता का प्रशिक्षण होता है और न ही जवाबदेही। हाईकोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि सरकार ऐसा नियामक ढांचा (रेगुलेटरी फ्रेमवर्क) बनाए, जिससे प्रेस की आजादी भी बनी रहे और फर्जी, गैर-जिम्मेदाराना तथा डराने-धमकाने वाली पत्रकारिता के लिए जवाबदेही भी तय हो।

सेल्फ स्टाइल रिपोर्टिंग से बढ़ सकता है तनाव' 

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कई बार खुद को रिपोर्टर बताने वाले लोग आक्रामक तरीके से सवाल पूछते हैं, अधूरी या एकतरफा खबरें दिखाते हैं और सनसनी फैलाने की कोशिश करते हैं. ऐसी रिपोर्टिंग से समाज में तनाव बढ़ सकता है, लोगों के बीच दूरी पैदा हो सकती है और कई बार सांप्रदायिक माहौल भी बिगड़ सकता है.

सीमापुरी में यूट्यूब रिपोर्टरों से मारपीट का मामला

दरअसल, यह टिप्पणी कोर्ट ने सीमापुरी में जुलाई 2025 में हुई एक घटना की सुनवाई के दौरान की. दो फ्रीलांस यूट्यूब रिपोर्टर कथित अवैध धार्मिक ढांचे पर वीडियो बना रहे थे. आरोप है कि वहां मौजूद भीड़ ने उनके साथ मारपीट की, मोबाइल फोन और कैमरे की बैटरी छीन ली इस मामले में गिरफ्तार दो लोगों ने हाईकोर्ट में जमानत की मांग की थी.

पुलिस की जांच पर भी कोर्ट नाराज

वहीं सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जांच अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने कहा कि पुलिस ने गलत दावा किया कि आरोपी वीडियो फुटेज में मारपीट करते दिखाई दे रहे हैं, जबकि रिकॉर्ड में ऐसा नहीं मिला. विरोधाभास स्पष्ट करने के लिए जांच अधिकारी के अदालत में पेश नहीं होने पर भी कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की.

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