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जलेबी... और बाबा महाकाल का जलवा!

आपकी कलम Published by: paliwalwani Updated Tue, 12 May 2026 10:25 PM
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उज्जैन के महाकाल मंदिर के पीछे एक गली थी, जहाँ एक हलवाई रहता था जिसका नाम था घीसू। वह रोज सुबह चार बजे जलेबी बनाता था, पर वह जलेबी बेचता नहीं था, चढ़ाता था।

लेबी वाला

घीसू के पिता ने दुकान शुरू की थी 1952 में। नाम था महाकाल जलेबी। दुकान छोटी, पर भीड़ बड़ी। क्योंकि घीसू की जलेबी कुरकुरी, रस भरी, और सस्ती थी।

पर घीसू का नियम था, पहली कड़ाही महाकाल को। वह चार बजे उठता, आटा गूंथता, चाशनी चढ़ाता। पाँच बजे पहली जलेबी तलता, थाल में सजाता, मंदिर के पिछले दरवाजे से पुजारी को देता। पुजारी भोग लगाता।

उसके बाद ही दुकान खोलता।

लोग पूछते, घीसू, धंधा कब करेगा। वह हँसता, धंधा तो महाकाल करता है, मैं तो प्रसाद बाँटता हूँ।

कर्ज

2020 में लॉकडाउन लगा। मंदिर बंद। भीड़ खत्म। घीसू की दुकान बंद हो गई। कर्ज बढ़ गया। बेटे ने कहा, पापा, पहली कड़ाही बंद करो, पहले ग्राहक को बेचो।

घीसू ने मना किया। वह रोज चार बजे उठता, एक छोटी कड़ाही में दस जलेबी बनाता, मंदिर के बंद दरवाजे पर रख आता। पुजारी नहीं था, पर वह रखता। कुत्ते खा जाते।

पत्नी बोली, पागल हो गए हो। घर में आटा नहीं, और तुम भगवान को चढ़ा रहे हो जो बंद है।

घीसू बोला, भगवान बंद नहीं, दरवाजा बंद है।

कर्जदार आए, धमकाया। घीसू ने कड़ाही बेच दी। अब वह हाथ से जलेबी बनाता, तवे पर।

एक दिन बेटा बोला, मैं पुणे जा रहा हूँ, नौकरी मिली है। घीसू ने आशीर्वाद दिया, पहली तनख्वाह से महाकाल को जलेबी चढ़ाना।

वापसी

मंदिर खुला, 2021 में। भीड़ लौटी। घीसू के पास कड़ाही नहीं थी। उसने तवे पर जलेबी बनानी शुरू की। लोग हँसे, घीसू बूढ़ा हो गया।

एक सुबह एक बूढ़ा साधु आया। मैले कपड़े, लंबी जटा। बोला, जलेबी खाऊँगा।

घीसू ने तवे की गरम जलेबी दी। साधु ने खाई, आँख बंद की, बोला, वही स्वाद।

घीसू चौंका, आपने पहले खाई है।

साधु बोला, 1978 में तुम्हारे पिता के हाथ की। मैं रोज पहली कड़ाही खाता था, जब मैं यहाँ श्मशान में रहता था। तुम चार बजे रखते थे, मैं पाँच बजे उठा लेता था। मंदिर बंद था तब भी।

घीसू की आँख भर आई। साधु ने झोली से एक छोटी पीतल की कड़ाही निकाली। बोला, यह रखो। मेरे गुरु ने दी थी। अब तुम्हारी।

घीसू ने मना किया। साधु बोला, मैं जा रहा हूँ, मुझे अब जलेबी नहीं, मुक्ति चाहिए।

साधु चला गया। घीसू ने कड़ाही देखी, अंदर एक पर्ची थी, लिखा था, कर्ज माफ।

उसी दिन कर्जदार आया, बोला, किसी ने तुम्हारा कर्ज चुका दिया। अनाम दान।

रहस्य

घीसू ने फिर पहली कड़ाही शुरू की। भीड़ बढ़ी। लोग कहते, घीसू की जलेबी में अब अमृत है।

एक दिन वही साधु फिर दिखा, महाकाल की शाही सवारी में। घीसू दौड़ा, पर भीड़ में खो गया।

पुजारी ने बाद में बताया, वह साधु नहीं, महाकाल के नागा संत थे, जो हर बारह साल में आते हैं। वे उसी प्रसाद को खाते हैं जो बिना ग्राहक के चढ़े।

घीसू समझ गया, वह दो साल तक बंद दरवाजे पर जो जलेबी रखता था, वह कुत्ते नहीं खाते थे।

आज

घीसू अब 68 साल का है। दुकान बेटा चलाता है। पर पहली कड़ाही अब भी घीसू बनाता है। चार बजे।

वह अब भी थाल लेकर पिछले दरवाजे जाता है। पुजारी लेता है। कभी-कभी थाल खाली लौटता है, कभी भरा। घीसू पूछता नहीं।

लोग पूछते हैं, बाबा, राज क्या है।

वह कहता है, जलेबी गोल है, इसका कोई शुरू, कोई अंत नहीं। धंधा भी ऐसा ही है। तुम शुरू करते हो ग्राहक से, मैं शुरू करता हूँ भगवान से। अंत में हिसाब वही करता है।

और उज्जैन में आज भी सुबह पाँच बजे महाकाल के भोग में घीसू की जलेबी चढ़ती है। पुजारी कहता है, भोग में मिठास नहीं, भरोसा चढ़ता है।

क्योंकि घीसू ने सिखा दिया, जब दरवाजे बंद हों, तब भी चढ़ाना मत छोड़ो। क्योंकि लेने वाला दरवाजे से नहीं आता।

रोहित पचौरिया

@साभार

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