राजबाड़ा का ट्रैफिक : प्रयोग बहुत, समाधान कब?

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अक्षय जैन

इंदौर. इंदौर की पहचान राजबाड़ा केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि शहर की व्यापारिक धड़कन भी है। लेकिन आज राजबाड़ा क्षेत्र में पहुंचते ही सबसे पहले इतिहास नहीं, अव्यवस्थित यातायात, अतिक्रमण और प्रबंधन की उलझी तस्वीर दिखाई देती है।

एक तरफ सड़क के बीच तक सिटी बस, दूसरी तरफ आने-जाने के लिए बचा सीमित रास्ता, उसी में ई-रिक्शा, ऑटो रिक्शा और दोपहिया वाहनों की आवाजाही। ऊपर से कभी किसी राजनीतिक कार्यक्रम का मंच, कभी किसी आयोजन की व्यवस्था। परिणाम साफ है सड़क छोटी और यातायात का दबाव बड़ा।

सबसे ज्यादा जोखिम उस समय पैदा होता है, जब बस, ई-रिक्शा या ऑटो रिक्शा अचानक टर्न लेते हैं। राजबाड़ा से लक्ष्मी मंदिर, वहां से यशवंत रोड और आगे एमजी रोड की दिशा में मुड़ने वाले मार्ग पर दोपहिया वाहन चालकों के लिए स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो जाती है। बड़े वाहन के मुड़ते समय छोटे वाहन उसकी आड़ में आ जाते हैं। मामूली टक्कर और विवाद की स्थिति रोजमर्रा की तस्वीर बनती जा रही है।

सवाल केवल रिक्शा चालकों या बस चालकों का नहीं है। सवाल उस यातायात व्यवस्था का है, जो सड़क पर मौजूद हर वाहन और पैदल यात्री को सुरक्षित जगह देने में असफल हो रही है।

फुटपाथ और सड़क पर कब्जे इस समस्या को और गंभीर बनाते हैं। जिस जगह पैदल चलने वालों के लिए होनी चाहिए, वहां दुकान का विस्तार, ठेला या अन्य गतिविधियां दिखाई देती हैं तो पैदल यात्री सड़क पर उतरता है। सड़क पर पहले से वाहनों का दबाव है और उसके बीच पैदल यात्री आ जाए तो दुर्घटना की आशंका बढ़ना स्वाभाविक है।

सबसे बड़ा प्रश्न नगर निगम और प्रशासन की भूमिका पर है। यदि रिमूव्हल दल लगातार मौजूद है, कार्रवाई के अधिकार और संसाधन भी हैं, तो फिर राजबाड़ा क्षेत्र बार-बार सड़क कब्जों की आगोश में क्यों आ जाता है? अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद कुछ ही समय में वही स्थिति लौट आती है तो समस्या कार्रवाई की कमी है या निरंतर निगरानी और स्थायी समाधान की?

यातायात व्यवस्था में भी यही सवाल है। कभी एकतरफा व्यवस्था, कभी मार्ग परिवर्तन, कभी बैरिकेडिंग, कभी नया प्रयोग प्रशासन प्रयोग करता रहे, इसमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन प्रयोग का अंतिम लक्ष्य जनहित में स्थायी सुधार होना चाहिए। यदि हर प्रयोग के बाद कुछ दिनों में वही जाम, वही अव्यवस्था और वही दुर्घटना की आशंका लौट आए तो फिर प्रयोग व्यवस्था का समाधान नहीं, केवल व्यवस्था की सक्रियता दिखाने का माध्यम बन जाता है।

राजबाड़ा को केवल वीआईपी आगमन, राजनीतिक मंचों और आयोजनों के समय व्यवस्थित दिखाना पर्याप्त नहीं है। राजबाड़ा के आम नागरिक को हर दिन सुरक्षित और सुगम रास्ता मिलना चाहिए।

प्रशासन को अब राजबाड़ा के लिए किसी और प्रयोग से पहले एक समग्र यातायात योजना बनानी होगी बसों के ठहराव और टर्निंग पॉइंट तय हों, ई-रिक्शा और ऑटो के लिए स्पष्ट लेन या स्टैंड हों, फुटपाथ पूरी तरह पैदल यात्रियों के लिए मुक्त हों, अतिक्रमण हटाने के बाद उसकी पुनरावृत्ति रोकने की जिम्मेदारी तय हो और व्यस्त चौराहों पर वास्तविक समय में यातायात नियंत्रण हो।

राजबाड़ा को प्रयोगशाला नहीं, समाधान का मॉडल बनाना होगा

क्योंकि ऐतिहासिक शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों से नहीं होती। उसकी असली पहचान इस बात से होती है कि वहां रहने वाला नागरिक और आने वाला पर्यटक कितनी सुरक्षित, सहज और सम्मानजनक तरीके से सड़क पर चल सकता है। आज जरूरत एक और प्रयोग की नहीं, दृढ़ निर्णय और ईमानदार क्रियान्वयन की है।

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