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डूंगरपुरकलेक्टर श्री सुरेन्द्र कुमार सोलंकी को मिला प्रधानमंत्री एक्सीलेंस अवार्ड - Paliwalwani.com

डूंगरपुरकलेक्टर श्री सुरेन्द्र कुमार सोलंकी को मिला प्रधानमंत्री एक्सीलेंस अवार्ड

Mahaveer vyas     Category: उदयपुर     29 Apr 2017 (11:21 AM)

उदयपुर। भारत विकास परिषद् शाखा डूंगरपुर संरक्षक श्री गिरीश पानेरी, अध्यक्ष श्री लक्ष्मीलाल जैन ने पालीवाल वाणी को बताया कि कलेक्टर श्री सुरेन्द्र कुमार सोलंकी को प्रधानमंत्री एक्सीलेंस अवार्ड मिलने पर शहर में हर्ष की लहर छा गई। इस मौके पर कलेक्टर परिसर में भारत विकास परिषद् शाखा डुंगरपुर संरक्षक सर्वश्री गिरीश पानेरी, अध्यक्ष लक्ष्मीलाल जैन, सचिव हीरालाल पटेल, हंसमुख पण्ड्या, जितेन्द्र सिंह, शैलेष कुमार भंडारी, हितेश भंडारी, विनोद पंचाल, दिनेश पण्ड्या, विजय पांचाल आदि प्रभारियों ने फुल माला, शाल उपरणा पहनाकर सम्मान किया। इस अवसर पर कलेक्टर महोदय ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कर कमलों से प्राप्त सम्मान डूंगरपुर जिले के निवासियों की सहभागिता व कड़ी मेहनत का श्रेष्ठ परिणाम है।

मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की प्रेरणा से मिला सम्मान

पुरस्कार ग्रहण करने के बाद डूंगरपुर जिला कलेक्टर श्री सुरेन्द्र कुमार सोलंकी नेे पालीवाल वाणी को बताया कि मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की प्रेरणा और राज्य सरकार के मार्गदर्शन एवं सहयोग के फलस्वरूप जिला प्रशासन की कडी मेहनत एवं सतत् प्रयासों की बदौलत पहली बार डूंगरपुर जिले को महिला सशक्तिकरण के प्रयासों के तहत अपनी तरह की अनूठी परियोजना एवं नवाचार के लिए यह सम्मान प्राप्त हुआ है।

सोलर लैम्प निर्माण परियोजना की अभूतपूर्व सफलता

श्री सुरेन्द्र कुमार सोलंकी नेे पालीवाल वाणी को बताया कि जिला प्रशासन डूंगरपुर ने राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका) के क्लस्टर स्तर महासंघों (सीएलएफ) के साथ साझेदारी करते हुए सोलर लैंप निर्माण परियोजना का सफल संचालन किया गया है। आदिवासी महिला इंजीनियरर्स ने आईआईटी मुम्बई से प्रशिक्षण लेकर अपनी कड़ी मेहनत एवं सार्थक प्रयासों की बदौलत सोलर लैम्प निर्माण परियोजना की अभूतपूर्व सफलता की नई कहानी लिख दी है। श्री सोलंकी ने बताया कि डूंगरपुर में महिला सशक्तिकरण की अनूठी इबारत लिखते हुए भारत में पहली बार जनजाति क्षेत्र की महिलाओं के स्वामित्व वाले सौर पैनल निर्माण संयत्र ‘दुर्गा’ की आधारशिला रखी गई है। यह संयत्र शीघ्र ही काम करना प्रारंभ करेगा।

महिला इंजीनियर्स के छायाचित्रों के साथ प्रमुखता से स्थान

प्रधानमंत्री द्वारा समारोह में लोक प्रशासकों द्वारा नवाचार विषय पर लोकार्पित पुस्तक में डूंगरपुर जिले के सोलर लैंप प्रोजेक्ट को महिला इंजीनियर्स के छायाचित्रों के साथ प्रमुखता से स्थान दिया गया है। जिला प्रशासन-डूंगरपुर ने राजीविका के क्लस्टर स्तर महासंघों (सीएलएफ) के साथ साझेदारी में जिले के दूरदराज के क्षेत्रों में ‘सौर अध्ययन लैंप’ वितरण कार्यक्रम (मिलियन सोउल परियोजना) शुरू करने के लिए आईआईटी मुम्बई को आमंत्रित किया गया। आईआईटी इस से पहले भी एक लाख सौर अध्ययन लैंप भारत के विभिन्न भागों में वितरित कर चुका है। डूंगरपुर में किफायती दरों पर लैम्प उपलब्ध कराने के लिए आइडिया सेल्युलर सीएसआर द्वारा मदद दी गई है।

लाईव प्रसारण देख गौरवान्वित हुई सोलर सखियां

डूंगरपुर के ईडीपी सभागार में दूरदर्शन दिल्ली, जयपुर एवं भोपाल से आई टीमों के सदस्यों के अथक प्रयासों से प्रोग्राम एज्यूकेटिव डॉ. वासुदेव के निर्देशन में जब दिल्ली में आयोजित समारोह का लाइव प्रसारण सोलर सखियों ने देखा तो अपने कार्य के लिए जिले को मिले इस सम्मान से गौरवान्वित हो खुशी से फुली नही समा रही थी। उनके चेहरे पर मेहनत से मिले परिणाम के सुखद अहस़ास को साफ-साफ महसूस किया जा रहा था।

डूंगरपुर राजस्थान के दक्षिण में बसा एक नगर

डूंगरपुर राजस्थान के दक्षिण में बसा एक नगर है। इसकी स्थापना 1282 में रावल वीर सिंह ने की थी। उन्होंने यह क्षेत्र भील प्रमुख डुंगरिया को हरा कर किया था जिनके नाम पर इस जगह का नाम डूंगरपुर पड़ा था। 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। यह जगह डूंगरपुर प्रिंसली स्टेट की राजधानी थी। यहां से होकर बहने वाली सोम और माही नदियां इसे उदयपुर और बांसवाड़ा से अलग करती हैं। पहाड़ों का नगर कहलाने वाला डूंगरपुर में जीव-जन्तुओं और पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां पाई जाती हैं। डूंगरपुर वास्तुकला की विशेष शैली के लिए जाना जाता है जो यहां के महलों और अन्य ऐतिहासिक इमारतों में देखी जा सकती है। राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर का मिला जुला क्षेत्र "वागड़" कहलाता है। वागड़ प्रदेश अपने उत्सव प्रेम के लिए जाना जाता है। यहां की मूल बोली "वागड़ी" है। जिस पर गुजराती भाषा का प्रभाव दिखाई देता है। वागड़ प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी भील आदिवासियों की है। वहा पर कलाल समाज के भी लोग रहते है। यह इलाका पहाड़ों से घिरा हुआ है,इन्हीं के तो बीच इन आदिवासियों का घेरा है।

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