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भक्ती के प्रेम से भगवान प्रकट हो जाते है -राजेश्वरानंद - Paliwalwani.com

भक्ती के प्रेम से भगवान प्रकट हो जाते है -राजेश्वरानंद

Suresh Bhat/Ayush Paliwal     Category: राजसमन्द     01 Jul 2015 (4:02 PM)

राजसमंद। श्रीरामायण प्रचार मंडल राजसमंद द्वारा भिक्षु निलयम में आयोजित साप्ताहित संगीतमय श्रीराम कथा के छठे दिन बुधवार को श्रीराम कथा में राजेश्वरानंदजी सरस्वती महाराज ने कहा कि व्यक्ति की भक्ती के प्रेम से भगवान प्रकट हो जाते है। व्यास पीठ से कथा का वाचन करते हुए महाराज ने व्यक्ती द्वारा भगवान के लिए की जाने वाली भक्ती की महत्वता बताते हुए कहा की भगवान का पता लग जाना प्राप्ती नही है बल्की उनके प्रति स्नेह जताना आवष्यक है क्योंकि हम परिवार में हर व्यक्ती के रिश्ते को प्रेम करते है इसलिए भगवान के लिए भी रिश्तेनाते के अनुरूप भाव होने चाहिए। उन्होने तुलसीदास के छंद का उल्लेख करते हुए तुलसीदास का राम के प्रति अटूट भक्ती प्रेम को आज कलयुग में भी पूजा जा रहा है। भगवान से सच्चा प्रेम करने वाला कहता हे कि तु पाप हरने वाला तो में पापी, तु दानी तो में भीखारी, तु नाथ में अनाथ, तु दु:ख हरण में दु:खी, तु भगवान में भक्त का हवाला देते हुए कहा की में आपको हर रूप पा सकता हु। कथा में महाराज ने बताया की तुलसीदस ने कहा राम से आप महाबलशाली अंगद का बाह पकड़ कर उसको सहि मार्ग परस्थ कर दो क्योंकि वह कब तक आपके चरण पकड़ पड़ा रहेगा आप तो भगवान हो उसका कल्याण अवष्य करोगे। उन्हाने ने बनारस में रहने वाले एक सम्पन्न व्यक्ती का उदाहरण देते हुए कहा की वह सम्पन्न होते हुए भी दु:खी था क्योंकि उसके बेटी नही थी वह एक संत के पास जाता है और अपनी आपबीती बताता है संत ने उसे उपाय बताया की बनारस में रहते और बेटी की चिंता जाओं राधारानी बिटियां आज से तुम्हारी बेटी। वह रोज नित्यकर्म से पहले अपनी बेटी को प्रणाम कर कार्य का शुभारंभ करता था। उन्होन भगवान की भक्त के प्रति भक्ती का परीणाम में कहा की कृष्ण कृपा से जीवन पथ पर नहीं कोई बाधा.... बड़भागी पिता हु बेटी मेरी राधा भजन प्रस्तुत कर श्रद्धालुओं को भाव विभार कर दिया। भगवान से जो रिश्ता जोड़ा है उसे निर्वहन करना क्योंकि भगवान को मानना ही भक्ती है। भगवान मूर्ती में नही मन में निवास करते है, भगनाव मेरे है यह हमारी भक्ती है भगवान ये हे यह हमारी आस्था को बताती है। ईसलिए भगवान कहते है मुझे मानकर तो देखो भाव से भक्ती करने का फल अपने आप आभाश हो जाता है। कथा में भजनों के दौरान श्रृद्धालु महिला-पुरूष तालियां बजाकर महाराज के भजनों का आनंद ले रहे थे। 

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