पालीवाल ब्राह्मणों का इतिहास....देवी रुख्मिनी पालीवालों की कुलदेवी - Paliwalwani

पालीवाल ब्राह्मणों का इतिहास....देवी रुख्मिनी पालीवालों की कुलदेवी

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पालीवाल ब्राह्मणों का इतिहास....
"माँ रुख्मिनी ने धन-धान्य व बहुत सारा आशीर्वाद दिया और कहा की कोई भी गौड़ ब्राम्हण कभी अन्न-धन हीन नहीं होगा ये समाज सदैव सु-संस्कारित व वैभवशाली रहेगा ।
उसी दिन से देवी रुख्मिनी पालीवालों की कुलदेवी के रूप में पूजित हैं ।
और उन्ही देवी लक्ष्मी के अवतार के आशीर्वाद से हम पालीवाल सम्पन्न व वैभवशाली हैं।
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इतिहास.....
किवदंती है कि पालीवाल ब्राह्मण महाराज हरिदास के वंशज हैं । ये लगभग 6 हजार वर्ष पूर्व हुए थे और महारानी रुक्मणी के पुरोहित थे। इन्होंने ही श्रीकृष्ण के पास रुक्मणी की प्रेमपांती पहुंचाई थी। वे उच्चश्रेणी के सच्चे ब्राह्मण थे। उनका जन्म ग्राम कुन्दनपुर में हुआ था। श्रीकृष्ण ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हें बहुत सा धन तथा गुजरात में जमीन दी थी, जिस पर उन्होंने अपने नाम पर हरिपुर ग्राम बसाया था जो अभी भी खण्डहर के रुप में मौजूद है । वहां से हमारे पुरखाओं का मारवाड़ जाने तथा पाली में बसने का उल्लेख इतिहास में मिलता है।
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ऋषि भरद्वाज खाण्डल विप्र समाज के अग्रज है।खाण्डल विप्रों के आदि प्रणेता ऋषि भरद्वाज हैं। मनुष्य को जगाने के लिए ऋषि एक स्थान पर कहते हैं-अग्नि को देखो यह मरणधर्मा मानवों स्थित अमर ज्योति है। यह अति विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कार्यों में प्रवीणतम ऋषि है जो मानव में रहती है। उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिए। अतः स्वयं को पहचानो। भाटुन्द गाँव के श्री आदोरजी महाराज भारद्वाज गोत्र के थे। सबसे ज्यादा जागीर वाले सेवड़ राजपुरोहितो की गोत्र भी भारद्वाज है, इनके आज भी कई ठिकाने, हवेलियां व कोटड़िया विद्यमान है।
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कुलधरा या कुलधर (Kuldhara or Kuldhar) भारतीय राज्य राजस्थान के जैसलमेर ज़िले में स्थित है एक शापित और रहस्यमयी गाँव है जिसे भूतों का गाँव (Haunted Village) (1) भी कहा जाता है। जैसलमेर के पश्चिम में 18 किलोमीटर दूर कुलधरा नाम का एक ऐसा गाँव है जहाँ क़रीब दो शताब्दियों से मरघट जैसी शांति है.आज भी कुलधरा शाम होते ही खाली हो जाता हे और कोई इन्सान वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता.जैसलमेर जब भी जाना हो तो कुलधरा जरुर जाए. ब्राह्मण के क्रोध और आत्मसम्मान का प्रतीक है, कुलधरा।
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श्रावण सुदी पूर्णिमा को रक्षाबंधन के दिन पालीवाल समाज के हजारों लोगों ने अपने धर्म स्वाभिमान को बचाने के लिए युद्ध के लिए निकल पड़े। इस युद्ध में हजारों ब्राह्मण मारे गए। उन ब्राह्मणों के बदन से 9 मन जनेऊ उतरी। इस युद्ध के बाद शेष रहे पालीवाल ब्राह्मणों ने धर्म की रक्षार्थ पाली छोड़ने का संकल्प लिया। इसके बाद एक ही रात में यहां से समाज के लोगों ने पलायन किया। युद्ध भूमि में मारे गये पालीवालों के शरीर से 9 मन जनेऊ निकली और जो स्त्रियाँ सती हुई थी, उनके चूड़ों का वजन 84 मन था, जो हाथी दांत के थे। इसमें से 4 गौत्र पाली छोड़कर पूर्वी पश्चिमी द्वार से गुजरात, आगरा, दिल्ली, उदयपुर की तरफ चले गए, जो बोहरा नंदवाना ब्राह्मण कहलाए। साथ ही पालीवाल ब्राह्मणों के शेष 8 गौत्र जैसलमेर रियासत में आकर बस गए। अत: यह निर्विवाद है कि पाली में रहने के कारण ही हम पालीवाल कहलाये।
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तेरहवीं शताब्दी में ही राज पुरोहित बैजल के छोटे भाई भोजल ने खमनोर में चारभुजानाथ का मन्दिर बनवाया और बड़े भाई राजुल ने बड़ा भाणुजा में लक्ष्मीनारायण का मन्दिर बनवाया। यह दोनों साथ-साथ बने और दोनों की प्रतिष्ठा का मुहुर्त एक ही दिन आया। मुहुर्त आगे पीछे रखने को परस्पर बहुत कहा सुना गया, किन्तु किसी ने नहीं माना और दोनों मन्दिरों की प्रतिष्ठा एक ही दिन की गई। मेवाड़ के समस्त पालीवाल दोनों ओर से बुलाये गये थे। अन्त में उस बुरे दिन समाज को दो भागों में बांट दिया, जो आज तक मौजूद है। भाणुजा में 44 गांव तथा खमनोर में 24 गांव के पालीवाल गये, वह श्रेणी आज तक चली आ रही है।
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मेवाड़ और इन्दौर में पालीवालों की मुख्य मुख्य 4 श्रेणियाँ हैं, जो 44 की श्रेणी, 24 की श्रेणी, मेणारिया एवं 52 की श्रेणियाँ कहलाती हैं। इनके अतिरिक्त नागदे, चुन्डा बोहरे आदि शाखाएं हैं, किन्तु इनमें कोई भेदभाव नहीं है। इनमें परस्पर वैवाहिक सम्बन्ध हैं। मेवाड़ के लगभग 300 गांवों में करीब 2 लाख पालीवाल रहते हैं।
जब मेवाड़ में दुश्काल पड़ा, तब सन् 1800 के करीब मेवाड़ के कुछ परिवार मालवा की ओर चल पड़े, जिनकी 2 शाखाएं प्रमुख थीं। एक शाखा सबसे पहले सीधी इन्दौर पहुँची, जिनमें कालूड़ा (कंजी का गड़ा) निवासी श्यामजी राजगुरु प्रथम व्यक्ति थे। दूसरी शाखा गुना होते हुए आगर से इन्दौर पहुँची, जिनमें लालाजी पुरोहित धनवल निवासी थे। इन्दौर के होल्कर महाराज हरिराव ने इन पालीवालों को अपने यहाँ रख लिया और नौकरियाँ दी।
सुनील पालीवाल
पालीवाल वाणी समाचार पत्र
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Sunil Paliwal-Indore M.P.
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Tags: देवी रुख्मिनी पालीवालों की कुलदेवी, पालीवाल ब्राह्मणों का इतिहास., मेवाड़ और इन्दौर में पालीवालों

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