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महाराणा प्रताप पर रिसर्च करने वाले डॉक्टर चन्द्रशेखर शर्मा

Rajendra Kumar Paneri...✍️     Category: आपकी कलम     27 Jul 2018 (3:30 AM)

महान इतिहासकार एवं साहित्यकार डॉ चंद्रशेखर जी शर्मा द्वारा लिखित ग्रन्थ “राष्ट्ररत्न प्रताप” व “युगन्धर प्रताप“ में जो अन्वेषण तथा इतिहास पर जो शोध कार्य किया गया है वह मेवाड़ के गौरवमय इतिहास के मान व सम्मान को ओर भी बुलंदिओ पर ले जाता है । महाराणा प्रताप पर रिसर्च करने वाले डॉक्टर चन्द्रशेखर शर्मा ने अपने रिसर्च पेपर में बताया है कि प्रताप बचपन से ही युद्ध में सेना के साथ पराक्रम दिखाते रहे थे। उन्होंने अपना पहला युद्ध केवल 9 साल की उम्र में लड़ा था। 9 मई 1540 में जन्में महाराणा का काफी वक्त कुंभलगढ़ में गुजरा। जहां उनकी मां जैवन्ताबाई से ही उन्होंने युद्ध कौशल के बारे में जाना। इसके बाद चित्तौड़गढ़ दुर्ग में भी उनके रहने की व्यवस्था राजसी ठाठ-बाठ से अलग तहखाने में की गई। कारण था कि महाराणा के प्रति पिता उदयसिंह का कम लगाव।
- इस दौरान ही उन्होंने अपनी शिक्षा भी पूरी की। सन 1549 में उदयसिंह और डूंगरपुर के रावल आसकरण के बीच सोम नदी के किनारे पर युद्ध हुआ। इस युद्ध में प्रताप ने भी हिस्सा लिया। इस वक्त उनकी उम्र मजह 9 साल थी।
- प्रताप ने इस युद्ध में सलूम्बर के राठौड़ों को परास्त कर छप्पन क्षेत्र को मेवाड़ राज्य के अधीन किया था। इसके बाद उन्होंने कई युद्ध लड़े। जिसमें उन्हें जीत हासिल हुई।
- प्रताप को अपना वारिस नहीं बनाना चाहते थे पिता उदयसिंह
डॉक्टर चन्द्रशेखर शर्मा की किताब राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप के अनुसार उदयसिंह अपनी चहेती रानी धर कंवर के पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था।
- उदयसिंह की मौत 28 फरवरी 1572 में हुई। राजवंशों में यह परम्परा रही कि बड़ा बेटा या उत्तराधिकारी मृत शासक की अंतिम क्रिया में हिस्सा नहीं लेता। वे शवयात्रा के बाद सिंहासन पर बैठता है। जिससे गद्दी खाली ना रहे।
- जब बड़े बेटे महाराणा प्रताप अंतिम संस्कार में पहुंचे तो सभी को पता चला कि जगमाल अगला उत्तराधिकारी होगा।
- इसके बाद प्रताप के मामा समेत कई लोगों ने जगमाल के उत्तराधिकारी बनाए जाने का विरोध किया। जिसके बाद जगमाल को गद्दी से हटा के महाराणा प्रताप की ताज पोशी 28 फरवरी 1572 को ही की गई।

जानिए, प्रताप के परिवार के बारे में...

- पिता :- महाराणा उदय सिंह, मां- जयवंताबाई सोनगरा।
- भाई :- शक्ति सिंह, खान सिंह, विरम देव, जेत सिंह, राय सिंह, जगमल, सगर, अगर, सिंहा, पच्छन, नारायणदास, सुलतान, लूणकरण, महेशदास, चंदा, सरदूल, रुद्र सिंह, भव सिंह, नेतसी, सिंह, बेरिसाल, मान सिंह, साहेब खान। (प्रताप के कुछ और किस्से यहां पढ़ें)
- पत्नियां :- अजब देपंवार, अमोलक दे चौहान, चंपा कंवर झाला, फूल कंवर राठौड़ प्रथम, रत्नकंवर पंवार, फूल कंवर राठौड़ द्वितीय, जसोदा चौहान, रत्नकंवर राठौड़, भगवत कंवर राठौड़, प्यार कंवर सोलंकी, शाहमेता हाड़ी, माधो कंवर राठौड़, आश कंवर खींचण, रणकंवर राठौड़।
- बेटे :- अमर सिंह, भगवानदास,सहसमल, गोपाल, काचरा, सांवलदास, दुर्जनसिंह, कल्याणदास, चंदा, शेखा, पूर्णमल, हाथी, रामसिंह, जसवंतसिंह, माना, नाथा, रायभान।
- बेटियां :- रखमावती, रामकंवर, कुसुमावती, दुर्गावती, सुक कंवर।
- कुम्भलगढ़ में जन्म थे महाराणा प्रताप।

मेवाड़ के गौरवमय इतिहास के मान व सम्मान को ओर भी बुलंदिओ पर ले जाता है...

महान इतिहासकार एवं साहित्यकार डॉ चंद्रशेखर जी शर्मा द्वारा लिखित ग्रन्थ “राष्ट्ररत्न प्रताप” व “युगन्धर प्रताप“ में जो अन्वेषण तथा इतिहास पर जो शोध कार्य किया गया है वह मेवाड़ के गौरवमय इतिहास के मान व सम्मान को ओर भी बुलंदिओ पर ले जाता है । वस्तुतः 1576 ई.में हुए हल्दीघाटी के इस युद्ध का विवरण विद्यालयों में पाठ्य पुस्तको के माध्यम से पढ़ाया भी जाता रहा है लेकिन उसमे विरोधाभास बहुत देखा गया है । अब शर्मा के शोध के बाद पाठ्यक्रम बदल गया है,हल्दीघाटी युद्ध प्रताप जीते थे।महाराणा प्रताप महान थे। कुछकथित सुविधाभोगी इतिहासकारों द्वारा लिखे गए इतिहास की गद्दारी की बू से विचलित भी हुआ था, तब कल्पना करता था की कभी मेवाड़ की धरा से ऐसा अंकुर अवश्य निकलेगा जो इस क्षेत्र में पूर्ण अध्ययन कर साक्ष्यो व तथ्यों के आधार के साथ कलम से उत्तर अवश्य देगा।

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अब आवश्यकता है तो चल कर हल्दीघाटी युद्धस्थली के रक्ततलाई नामक स्थान पर लगे उस प्रस्तर पर उकेरी गयी उन पंक्तियों को संसोधित करने की, जिसमें लिखा गया है की महाराणा प्रताप को मैदान से भागना पड़ा । सच है जब जब में वहां गया हूँ भ्रमित करने वाली इन पंक्तियों को पढ़ कर दिल बहुत चोटिल हुआ है। राजपूतों को लग रहा है कि उनके इतिहास से छेड़छाड़ करके उन्हें नीचा दिखाने का कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है. उन्हें यह भी लग रहा है कि उनके इतिहास को गलत रूप में प्रचारित किया जा रहा है, इसलिए अब वे उसे ठीक करना चाहते हैं. इसका ताजा उदाहरण महाराणा प्रताप से जुड़ी वह पुस्तक है, जिसमें यह दावा किया गया है कि हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप नहीं हारे थे, हार अकबर की सेना की हुई थी. ‘राष्ट्ररत्न महाराणा प्रताप’ नामक यह पुस्तक राजस्थान भाजपा के तीन बड़े नेताओं, पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री, स्कूल शिक्षा मंत्री और नगरीय विकास मंत्री की सिफारिश पर ‘रेफरेंस बुक’ के रूप में स्नातक-पूर्व विद्यार्थियों के लिए विश्वविद्यालय द्वारा सूची में शामिल कर ली गयी है. मांग तो इतिहास की पुस्तकों को बदलने की भी की जा रही है. यदि कोई फिल्मकार हमारे इतिहास को गलत रूप से चित्रित करता है, या फिर इतिहास के नाम पर कुछ गलत तथ्य पढ़ाये जा रहे हैं, तो इसका विरोध होना चाहिए, लेकिन ठोस आधारों पर होना चाहिए. इस बात का ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि भावनाओं के आधार पर इतिहास के साथ छेड़-छाड़ न हो। इतिहास को इतिहास रहने दें।

इतिहास नायकों के कृतित्व से बनता - संघर्ष, वीरता, उनका शौर्य

महाराणा प्रताप की गाथा हमारे इतिहास का एक गौरवपूर्ण अध्याय है. अपनी आजादी, अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए उनका संघर्ष अनूठा था इसीलिए वे हमारे इतिहास पुरुष हैं। ऐसे नायकों की कीर्ति गाथा को महिमामंडित करने के लिए इतिहास बदलने की जरूरत नहीं है. उनका संघर्ष, उनकी वीरता, उनका शौर्य ही उनकी महानता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है। इतिहास की पुस्तकों के अनुसार लगभग साढ़े पांच सौ साल पहले, 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ था कुल चार घंटे चले इस युद्ध में महाराणा प्रताप को पीछे हटना पड़ा था। यह बात दूसरी है कि शीघ्र ही उन्होंने कुंभलगढ़ पर फिर अधिकार कर लिया महाराणा प्रताप हिंदू थे और अकबर मुसलमान, लेकिन हल्दीघाटी की लड़ाई हिंदू-मुसलमान की लड़ाई नहीं थी। इस लड़ाई में अकबर की सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे और शेरशाह सूरी का वंशज हकीम खान सूरी महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ रहा था। इतिहास को इतिहास की दृष्टि से ही देखना चाहिए, अकबर और महाराणा प्रताप हमारा इतिहास हैं, इतिहास के नायक हैं। उन्हें हिंदू या मुसलमान नायक के रूप में देखने का अर्थ अंगरेज इतिहासकारों की नजर से उन्हें देखना होगा। न दोनों की तुलना की आवश्यकता है, न किसी को कम महान दिखाने की। इतिहास नायकों के कृतित्व से बनता है। आवश्यकता उनके कृतित्व को समझ कर उससे कुछ सीखने की है। तभी हम ऐसा इतिहास रच पायेंगे, जो आनेवाले कल की प्रेरणा बनेगा।
डॉ. चंद्रशेखर जी शर्मा को श्री राजेन्द्र कुमार जी पानेरी, मेनारिया ब्राह्मण समाज ओर पालीवाल वाणी समाचार पत्र की ओर बहुत बहुत नमन व बधाई की आपने मेवाड़ का मान बढ़ाया।
राष्ट्र रत्न, महाराणा प्रताप : समग्र ऐतिहासिक जीवन-दर्शन, अपराजेय संघर्ष की मीमांसा, वैश्यिक दृष्टि से योगदान और प्रासंगिकता-आर्यावर्त संस्कृति संस्थान-8190644904, 9788190644907 

राजेन्द्र कुमार जी पानेरी की नजर में महाराणा प्रताप पर रिसर्च करने वाले डॉक्टर चन्द्रशेखर शर्मा...✍️

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