Latest News
      1. श्री पालीवाल ब्राह्मण समाज 24 श्रेणी इंदौर नवरात्री सांस्कृतिक महोत्सव का रंग चढ़ा परवान पर       2. निस्वार्थ भाव से दीन दुखियों की मदद करना ही सच्ची मानव सेवा : श्री साईं ज्योति फाउंडेशन      3. निस्वार्थ भाव से दीन दुखियों की मदद करना ही सच्ची मानव सेवा : श्री साईं ज्योति फाउंडेशन      4. केलवा में श्री अंबा माताजी का नवरात्रि जागरण सातम 16 अक्टूबर को      5. श्री अंबा माताजी के नवरात्रि जागरण का कार्यक्रम 16 अक्टूबर को-सपरिवार सादर आमंत्रित      6. कुंवारिया मेले में उमड़े मेलार्थी-विशाल भजन संध्या भौंर तक जमे दर्शक

नौजवान देखें नये समाज निर्माण का स्वप्न !

Lalit Garg     Category: आपकी कलम     12 Aug 2016 (11:59 AM)

सारी दुनिया प्रतिवर्ष 12 अगस्त को अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाती है। सन् 2000 में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरम्भ किया गया था। यह दिवस मनाने का मतलब है कि पूरी दुनिया की सरकारें युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। न केवल सरकारें बल्कि आम-जनजीवन में भी युवकोें की स्थिति, उनके सपने, उनका जीवन लक्ष्य आदि पर चर्चाएं हो। युवाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इन्हीं मूलभूत बातों को लेकर यह दिवस मनाया जाता है।  इस दिवस का विधिवत प्रारंभ होने से पहले संयुक्त राष्ट्र ने इसकी पृष्ठभूमि पर 1977 में काम करना प्रारम्भ किया था। चार चरणों की महत्त्वपूर्ण बैठक के बाद 1985 में संयुक्त राष्ट्र ने पहले अंतर्राष्ट्रीय युवा पर्व की घोषणा की। दस वर्ष पूरे होने पर संयुक्त राष्ट्र ने युवाओं की स्थिति सुधारने के लिए वैश्विक कार्यक्रम की संकल्पना की। जिसमें शिक्षा, रोजगार, भूख, गरीबी, स्वास्थ्य, पर्यावरण, नशा मुक्ति, बाल अपराध, अवकाश के दौरान की गई गतिविधियाँ, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, एड्स, युवा से जुड़े विवाद और पीढ़ीगत सम्बन्ध आदि पंद्रह सूत्रीय समस्याओं को केंद्र में रखा गया। इसके बाद सन् 2000 में  अन्तर्राष्ट्रीय युवा दिवस पहली बार मनाया गया, जिसकी तिथि 12 अगस्त घोषित की गई। तब से लेकर हर वर्ष इसका आयोजन बहुत ही नियोजित ढंग से उत्साहपूर्ण परिवेश में होता है। इसका उद्देश्य युवाओं में गुणवत्तापूर्ण विकास करना और उन्हें सामाजिक एवं राष्ट्रीय सहभागिता के लिए तैयार करना है। हालांकि यह एक कैथोलिक मान्यता के अंतर्गत शुरू किया गया था, लेकिन वर्तमान परिदृश्य और वैश्विक रूप में युवाओं की बढ़ती भागीदारी से यह सभी सीमाओं को लाँघकर विश्वभर में मनाया जाने लगा।

युवा किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य हैं- वो देश की नींव हैं, जिस पर देश की प्रगति और विकास निर्भर करता है। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे विकसित और विकासशील राष्ट्र हैं, जहाँ नौजवान ऊर्जा व्यर्थ हो रही है। कई देशों में शिक्षा के लिए जरूरी आधारभूत संरचना की कमी है तो कहीं प्रछन्न बेरोजगारी जैसे हालात हैं। इन स्थितियों के बावजूद युवाओें को एक उन्नत एवं आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करना वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। युवा सपनों को आकार देने का अर्थ है सम्पूर्ण मानव जाति के उन्नत भविष्य का निर्माण। यह सच है कि हर दिन के साथ जीवन का एक नया लिफाफा खुलता है, नए अस्तित्व के साथ, नए अर्थ की शुरूआत के साथ, नयी जीवन दिशाओं के साथ। हर नई आंख देखती है इस संसार को अपनी ताजगी भरी नजरों से। इनमें जो सपने उगते हैं इन्हीं में नये समाज की, नयी आदमी की नींव रखी जाती है। विचारों के नभ पर कल्पना के इन्द्रधनुष टांगने मात्र से कुछ होने वाला नहीं है, बेहतर जिंदगी जीने के लिए मनुष्य को संघर्ष आमंत्रित करना होगा। वह संघर्ष होगा विश्व के सार्वभौम मूल्यों और मानदंडों को बदलने के लिए। सत्ता, संपदा, धर्म और जाति के आधार पर मनुष्य का जो मूल्यांकन हो रहा है मानव जाति के हित में नहीं है। दूसरा भी तो कोई पैमाना होगा, मनुष्य के अंकन का, पर उसे काम में नहीं लिया जा रहा है। क्योंकि उसमें अहं को पोषण देने की सुविधा नहीं है। क्योंकि वह रास्ता जोखिम भरा है। क्योंकि उस रास्तें में व्यक्तिगत स्वार्थ और व्यामोह की सुरक्षा नहीं है। युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि संघर्ष को आमंत्रित करे, मूल्यांकन का पैमाना बदले, अहं को तोड़े, जोखिम का स्वागत करे, स्वार्थ और व्यामोह से ऊपर उठे।

युवा दिवस मनाने का मतलब है- एक दिन युवकों के नाम। इस दिन पूरे विश्व में युवापीढ़ी के संदर्भ में चर्चा होगी, उसके हृास और विकास पर चिंतन होगा, उसकी समस्याओं पर विचार होगा और ऐसे रास्ते खोजे जायेंगे, जो इस पीढ़ी को एक सुंदर भविष्य दे सकें। इसका सबसे पहला लाभ तो यही है कि संसार भर में एक वातावरण बन रहा है युवापीढ़ी को अधिक सक्षम और तेजस्वी बनाने के लिए। युवकों से संबंधित संस्थाओं को सचेत और सावधान करना होगा और कोई ऐसा सकारात्मक कार्यक्रम हाथ में लेना होगा, जिसमें निर्माण की प्रक्रिया अपनी गति से चलती रहे। विशेषतः राजनीति में युवकों की सकारात्मक एवं सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करना होगा।  स्वामी विवेकानन्द ने भारत के नवनिर्माण के लिये मात्र सौ युवकों की अपेक्षा की थी। क्योंकि वे जानते थे कि युवा विजनरी होते हैं और उनका विजन दूरगामी एवं बुनियादी होता है। उनमें नव निर्माण करने की क्षमता होती है। अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक सरवाइविंग द फ्यूचर में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना। उनको यह इसलिये कहना पड़ा क्योंकि जो जोश उनमें भरा जाता है, यौवन के परिपक्व होते ही उन चीजों को भावुकता या जवानी का जोश कहकर भूलने लगते हैं। वे नीति विरोधी काम करने लगते है, गलत और विध्वंसकारी दिशाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिये युवकों के लिये जरूरी है कि वे जोश के साथ होश कायम रखे। वे अगर ऐसा कर सके तो भविष्य उनके हाथों संवर सकता है। इसीलिये सुकरात को भी नवयुवकों पर पूरा भरोसा था। वे जानते थे कि नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का जो बीज बो दें तो वही उग आता है। एथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोनेे की क्षमता रखता था। आज की युवापीढ़ी में उर्वर दिमागों की कमी नहीं है मगर उनके दिलो दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वालेे स्वामी विवेकानन्द और सुकरात जैसे लोग दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं, जो नई प्रतिभाओं को उभारने के लिए ईमानदारी से प्रयास करते हैं? हेनरी मिलर ने एक बार कहा था- ‘‘मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवक में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है। महादेवी वर्मा ने भी कहा है बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरुणाई सबल होती है।’’  युवापीढ़ी के सामने दो रास्ते हैं-एक रास्ता है निर्माण का दूसरा रास्ता है ध्वंस का। जहां तक ध्वंस का प्रश्न है, उसे सिखाने की जरूरत नहीं है। अनपढ़, अशिक्षित और अक्षम युवा भी ध्वंस कर सकता है। वास्तव में देखा जाए तो ध्वंस क्रिया नहीं, प्रतिक्रिया है। उपेक्षित, आहत, प्रताड़ित और महत्वाकांक्षी व्यक्ति खुले रूप में ध्वंस के मैदान में उतर जाता है। उसके लिए न योजना बनाने की जरूरत है और न सामग्री जुटाने की। योजनाबद्ध रूप में भी ध्वंस किया जाता है, पर वह ध्वंस के लिए अपरिहार्यता नहीं है। निर्माण का सही लक्ष्य प्राप्त न होने का एक कारण है व्यक्ति की बहिर्मुखता। बहिर्मुख व्यक्ति ऊपर-ऊपर की बातों में उलझता रहता है, भीतर से नहीं पैठता। ऊपर-ऊपर रहने वाला समुद्र के तल में पड़े रत्नों को कैसे पा सकता है? ऊपर के रंग-रूप में उलझने वाला गुणात्मकता ही पहचान कर सकता है? युवापीढ़ी से समाज और देश को बहुत अपेक्षाएं हैं। शरीर पर जितने रोम होते हैं, उनसे भी अधिक उम्मीदें इस पीढ़ी से की जा सकती हैं। उन्हें पूरा करने के लिए युवकों की इच्छाशक्ति संकल्पशक्ति का जागरण करना होगा। घनीभूत इच्छाशक्ति एवं मजबूत संकल्पशक्ति से रास्ते के सारे अवरोध दूर हो जाते हैं और व्यक्ति अपनी मंजिल तक पहुंच जाता है। मूल प्रश्न है कि क्या हमारे आज के नौजवान भारत को एक सक्षम देश बनाने का स्वप्न देखते हैं? या कि हमारी वर्तमान युवा पीढ़ी केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से जन्मी आत्मकेन्द्रित पीढ़ी है? दोनों में से सच क्या है? दरअसल हमारी युवा पीढ़ी महज स्वप्नजीवी पीढ़ी नहीं है, वह रोज यथार्थ से जूझती है, उसके सामने भ्रष्टाचार, आरक्षण का बिगड़ता स्वरूप, महंगी होती जाती शिक्षा, कैरियर की चुनौती और उनकी नैसर्गिक प्रतिभा को कुचलने की राजनीति विसंगतियां जैसी तमाम विषमताओं और अवरोधों की ढेरों समस्याएं भी हैं। उनके पास कोरे स्वप्न ही नहीं, बल्कि आंखों में किरकिराता सच भी है। इन जटिल स्थितियों से लौहा लेने की ताकत युवक में ही हैं। क्योंकि युवक शब्द क्रांति का प्रतीक है। इसीलिये युवापीढ़ी पर यह दायित्व है कि वह युवा दिवस पर कोई ऐसी क्रांति करे, जिससे युवकों को जीवनशैली में रचनात्मक परिवर्तन आ सके, हिंसा-आतंक की राह को छोड़कर वे निर्माण की नयी पगडंडियों पर अग्रसर हो सके।  

 ललित गर्ग
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

Paliwal Menariya Samaj Gaurav